25 Bol Ki Charcha

25 Bol Ki Charcha (पच्चीस बोल की चर्चा)

  1. पहला बोल-गति चार

 

  • एक गति किसमें ? मनुष्य में ।

     संसार के सभी जीवों में अपनी अपनी एक ही गति पाती है । नारक जीवों में नरक गति, तिर्यंच जीवों में तिर्यंच गति, मनुष्यों में मनुष्य गति, देवों में देवगति ।

 

  • दो गति किसमें ? श्रावक में-मनुष्य व तिर्यंच ।

     देव और नारक में व्रत धारण की योग्यता नहीं होती, अतः वे श्रावक नहीं बनते । मनुष्य व्रतधारी श्रावक होता है । संज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय प्राणी भी जाति-स्मृति ज्ञान होने पर व्रत धारण कर श्रावक बन सकते है । उदाहरण के रूप में नंदन-मणिहारा का जीव,  चंडकौशिक का जीव व्रतधारी बने । अनशन स्वीकार कर देवलोक में गए ।

 

  • तीन गति किसमें ? नपुंसक वेद में (देवता को छोड़कर) ।

     मनुष्य और तिर्यंच में स्त्रीवेद,  पुरुषवेद व नपुंसक वेद तीनों पाए जाते है । नारक जीव नपुंसक ही होते है । देवता में स्त्रीवेद और पुरुषवेद दो ही पाते है, वे नपुंसक नहीं होते । इसलिए उन्हें छोड़ा गया है ।

 

  • चार गति किसमें ? समुच्चय जीव में ।

      संसार के समस्त जीवों में एक साथ पूछा जाए तो चार गति कहा जा सकता है ।

  1. दूसरा बोल – जाति पांच

 

  • एक जाति किसमें ? एकेन्द्रिय में ।

      मूलतः सभी जीवों में अपनी अपनी जाति होती है । एकेन्द्रिय जीवों में एकेन्द्रिय जाति,  द्विन्द्रिय जीवों में द्विन्द्रिय जाति,  त्रिन्द्रिय जीवों में त्रिन्द्रिय जाति,  चतुरिन्द्रिय जीवों में चतुरिन्द्रिय जाति,  पंचेंद्रिय जीवों में पंचेंद्रिय जाति पाई जाती है । प्रस्तुत बोल में उत्तर एक ही दिया गया है ।

 

  • दो जाति किसमें ? वैक्रिय शरीर में — एकेन्द्रिय, पंचेंद्रिय ।

      वायुकाय एकेन्द्रिय है । उसके औदारिक और वैक्रिय दो शरीर होते हैं । सामान्यतः वायुकाय में औदारिक शरीर होता है,  पर जब वह वातूल का रूप धारण करती है,  तब उसका शरीर वैक्रिय हो जाता है । वैक्रिय बादर वायुकाय ही करती है,  सूक्ष्म वायुकाय नहीं ।

       नारक और देव वैक्रिय शरीरी ही होते हैं । संज्ञी  मनुष्य और संज्ञी तिर्यंच पंचेंद्रिय के वैक्रियलब्धिजन्य वैक्रिय शरीर हो सकता है ।

 

  • तीन जाति किसमें ? तीन विकलेन्द्रिय में ।

     विकलेन्द्रिय एक पारिभाषिक शब्द है । यह द्विन्द्रिय, त्रीन्द्रिय एवं चतुरिन्द्रिय इन तीनों के लिए प्रयुक्त होता है । विकलेन्द्रिय का अर्थ है-अपूर्ण इन्द्रिय । यद्यपि एकेन्द्रिय जीव भी अपूर्ण इन्द्रिय वाले है । उनमें एक ही इन्द्रिय होती है, पर उसे विकलेन्द्रिय की गणना में नहीं लिया गया है । एकेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय के मध्यवर्ती तीनों जाति को विकलेन्द्रिय कहा है ।

 

  • चार जाति किसमें ? त्रसकाय में ( एकेन्द्रिय छोड़कर)

      एकेन्द्रिय स्थावर काय कहलाती है । त्रसकाय में द्विन्द्रिय, त्रिन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय एवं पंचेंद्रिय चारों जातियां आ जाती हैं ।

 

  • पांच जाति किसमें ? समुच्चय जीव में ।

     संसार के समस्त जीवों का एक साथ कथन किया जाए तो पांचों ही जातियां हैं ।

  1. तीसरा बोल – काय छह

 

  • एक काय किसमें ? साधु में — त्रसकाय ।

      यहां उत्तर एक ही दिया गया है ।  वैसे एक काय सबमें अपनी अपनी होती है । पृथ्वीकायिक जीवों में पृथ्वीकाय,  अप्कायिक जीवों में अप्काय,  अग्नि के जीवों में तेजसकाय,  वायु के जीवों में वायुकाय, वनस्पति के जीवों में वनस्पतिकाय और त्रस जीवों में त्रसकाय पायी जाती है ।

 

  • दो काय किसमें ? वैक्रिय शरीर में– वायुकाय, त्रसकाय ।

    वैक्रिय शरीर वायुकाय और त्रसकाय दो में ही होता है । (देखें बोल दूसरा) ।

 

  • तीन काय किसमें ? तेजोलेश्या-एकेन्द्रिय में — पृथ्वी, अप्, वनस्पति ।

      भवनपति से लेकर दूसरे देवलोक तक के देवों में तेजोलेश्या होती है । वे देवलोक से च्यवन करके यदि पृथ्वी, अप् और वनस्पति में उत्पन्न होते हैं तो अपर्याप्त अवस्था तक इन तीनों कायों में तेजोलेश्या रहती है । यह नियम है कि जीव जिस लेश्या में मरता है उसी लेश्या में जन्म लेता है ।

      यह भी ज्ञातव्य है कि देव पृथ्वी, पानी, वनस्पति में आएंगे तो श्रेष्ठ मनोहर स्थानों में ही जन्म लेंगे । जैसे हीरे-पन्ने की खान, बगीचे आदि । देव च्युत होकर तेजस्काय, वायुकाय में जन्म नहीं लेते, अतः तेजोलेश्या-एकेन्द्रिय में तीन काय ली गई है ।

 

  • चार काय किसमें ? तेजोलेश्या में(तेजस, वायु को छोड़कर) ।

     तेजसकाय व वायुकाय में तेजोलेश्या नहीं पाती ।

 

  • पांच काय किसमें ? एकेन्द्रिय में(त्रसकाय को छोड़कर) ।

     पांच स्थावरकाय एकेन्द्रिय कहलाती है ।

 

  • छह काय किसमें ? समुच्चय जीव में ।

     समुच्चय जीव का तात्पर्य पूर्ववत समझना चाहिए ।

  1. चौथा बोल-इन्द्रिय पांच

 

  • एक इन्द्रिय किसमें ? पृथ्वीकाय में –स्पर्शनेन्द्रिय ।

    सभी स्थावर जीवों में एक स्पर्शनेन्द्रिय कही जा सकती है ।

 

  • दो इन्द्रिय किसमें ? लट, गिंडोला में–रसनेन्द्रिय, स्पर्शनेन्द्रिय ।

    दो इन्द्रिय वाले जितने भी जीव है, सभी में दो इन्द्रिय ही पाती है ।

 

  • तीन इन्द्रिय किसमें ? चींटी, मकोड़ा आदि ने–घ्राणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, स्पर्शनेन्द्रिय ।

     तीन इन्द्रियवाले जितने जीव है, जूं,  लीख,  खटमल आदि सबमें तीन इन्द्रिय ही पाती है ।

 

  • चार इन्द्रिय किसमें ? मक्खी, मच्छर में । (श्रोत्रेन्द्रिय को छोड़कर)

      चार इन्द्रिय वाले जितने जीव हैं,  बिच्छू,  कसारी आदि सबमें चार इन्द्रिय ही पाई जाती है ।

 

  • पांच इन्द्रिय किसमें ? समुच्चय जीव में ।

     पांच इन्द्रिय वाले जितने जीव हैं,  मनुष्य, तिर्यंच, नारक, देव — सबमें पांच इन्द्रिय पाई जाती है ।

  1. पांचवां बोल — पर्याप्ति छह

 

  • एक पर्याप्ति किसमें ? शरीर पर्याप्ति के अलब्धिया में — आहार पर्याप्ति ।

        लब्धि अर्थात प्राप्ति । अलब्धि अर्थात अप्राप्ति । आहार पर्याप्ति पूर्ण हो गई पर जब तक पर्याप्ति पूर्ण न हो तब तक वह जीव एक आहार पर्याप्ति वाला माना जाएगा ।

 

  • दो पर्याप्ति किसमें ? इन्द्रिय पर्याप्ति के अलब्धिया में — आहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति ।

        आहार पर्याप्ति और शरीर पर्याप्ति पूर्ण हो गई पर जब तक इन्द्रिय पर्याप्ति पूर्ण न हो तब तक वह जीव दो पर्याप्ति वाला माना जाएगा । ज्ञातव्य है कि पर्याप्तियां एक साथ पूर्ण नहीं होतीं,  क्रमशः होती हैं ।

 

  • तीन पर्याप्ति किसमें ? एकेन्द्रिय अपर्याप्त में — आहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति, इन्द्रिय पर्याप्ति ।

        एकेन्द्रिय जीव श्वासोच्छवास पर्याप्ति पूर्ण होने पर ही पर्याप्त होते हैं । चार पर्याप्ति पूर्ण होने से पहले जो जीव मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं वे अपर्याप्त कहलाते हैं । असंज्ञी मनुष्य में भी तीन पर्याप्ति ही पाती है । चौथी पूर्ण होने से पहले वे मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं ।

 

  • चार पर्याप्ति क़िसमें ? एकेन्द्रिय में (मन एवं भाषा पर्याप्ति को छोड़कर )

     स्प्ष्ट है ।

 

  • पांच पर्याप्ति क़िसमें ? असंज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय में (मनः पर्याप्ति को छोड़कर)

     तीन विकलेन्द्रिय और असंज्ञी प्राणी के मन नहीं होता । इसलिए उनमें पांच पर्याप्ति हैं । देवों में मन और भाषा का एक साथ कथन होने के कारण उनमे पांच पर्याप्ति कह सकते हैं ।

   

  • छह पर्याप्ति किसमे ? समुच्चय जीव में ।

      संज्ञी मनुष्य, संज्ञी तिर्यंच और नारक में छह पर्याप्ति कह सकते हैं ।

  1. छठा बोल — प्राण दस

 

  • एक प्राण किसमे ? चौदहवें गुणस्थान में — आयुष्यबल प्राण ।

     चौदहवां गुणस्थान अयोगी है । उसमें श्वासोच्छवास की क्रिया भी रुक जाती है,  अतः प्राण एक ही है ।

 

  • दो प्राण किसमे ? अंतराल गति में । कायबल प्राण, आयुष्यबल प्राण ।

      अंतराल गति में तैजस शरीर और कार्मण शरीर की अपेक्षा काय बल प्राण और आयुष्य भोग की दृष्टि से आयुष्य बल प्राण है । यह आयुष्य बल प्राण जिस गति में जीव जा रहा है उसकी अपेक्षा से है । अंतराल गति में नये जन्म का आयुष्य ही भोगा जाता है ।

 

  • तीन प्राण किसमें ? एकेन्द्रिय अपर्याप्त में — स्पर्शनेंद्रिय प्राण, कायबल प्राण, आयुष्यबल प्राण ।

     एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों में एक स्पर्शनेंद्रिय होने की अपेक्षा से स्पर्शनेंद्रिय प्राण, शरीर की अपेक्षा कायबल प्राण और आयुष्य भोग की अपेक्षा आयुष्यबल प्राण है ।

 

  • चार प्राण किसमें ? एकेन्द्रिय पर्याप्त में — स्पर्शनेंद्रिय प्राण, कायबल प्राण, श्वासोच्छवास प्राण, आयुष्यबल प्राण ।

       ये एकेन्द्रिय पर्याप्त में पाए जाते हैं ।

 

  • पांच प्राण किसमें ? तेरहवें गुणस्थान में (पांच इन्द्रियों को छोड़कर) ।

       इन्द्रियां दर्शनावरणीय कर्म के क्षयोपशम से प्राप्त होती हैं । तेरहवें गुणस्थान में उस कर्म का क्षायिक भाव है । इसलिए वहां इन्द्रियों का उपयोग नही होता । केवलज्ञान के द्वारा ही संपूर्ण पदार्थों का बोध होता है ।

 

  • छह प्राण किसमें ? द्वीन्द्रिय में — स्पर्शनेंद्रिय, रसनेंद्रिय, वचनबल, कायबल, श्वासोच्छ्वास प्राण, आयुष्य प्राण ।

 

  • सात प्राण किसमें ? त्रिन्द्रिय में (श्रोत्रेन्द्रिय, चक्षुरिन्द्रिय एवं मन को छोड़कर) ।

 

  • आठ प्राण किसमें ? चतुरिन्द्रिय में (श्रोत्रेन्द्रिय एवं मन को छोड़कर) ।

 

  • नौ प्राण किसमें ? असंज्ञी तिर्यंच पंचेंद्रिय में(मन को छोड़कर) ।

 

  • दस प्राण किसमें ? समुच्चय जीव में । संज्ञी पंचेंद्रिय में ।

 

     छह प्राण से दस प्राण तक के बोल स्वतः स्पस्ट हैं ।

  1. सातवां बोल–शरीर पांच

 

  • एक शरीर किसमें ? एक शरीर किसी में नहीं पाता ।

 

  • दो शरीर किसमें ? अंतराल गति में–तैजस,  कार्मण । ये दोनों शरीर साथ में ही रहते हैं ।

 

  • तीन शरीर किसमें ? पृथ्वीकाय में–औदारिक, तैजस,  कार्मण ।

         वायुकाय को छोड़कर चार स्थावर, तीन विकलेन्द्रिय, असंज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय, अप्रमत्त साधु में भी तीन शरीर कहे जा सकते हैं ।  नारकी,  देवता में तीन शरीर–वैक्रिय,  तैजस,  कार्मण कहे जा सकते हैं ।

 

  • चार शरीर किसमें ? वायुकाय में (आहारक को छोड़कर) ।

वायुकाय में औदारिक और वैक्रिय दोनों शरीर होते हैं ।   इसलिए वायुकाय में चार शरीर पाए जाते हैं ।

 

  • पांच शरीर किसमें ? समुच्चय जीव में/छठे गुणस्थान में ।

            छठा गुणस्थान साधु में पाता में पाता साधु में पाता है ।  उसमें तीन शरीर तो होते ही हैं ।  जो साधु वैक्रियलब्धि  और आहारकलब्धि संपन्न होते हैं, उनमें आहारक और वैक्रिय शरीर भी पाते हैं ।  इस दृष्टि से छठे गुणस्थान में पांचों शरीर पाते हैं ।  सातवें गुणस्थान से साधु अप्रमत्त होते हैं ।  अप्रमत्त साधु लब्धि का प्रयोग नहीं करते ।

  1. आठवां बोल–योग पन्द्रह

 

  • एक योग क़िसमें ? दिखाई देते हुए अनाज के दाने में–औदारिक काययोग ।

     दिखाई देने वाले अनाज का दाना पर्याप्त होता है । अतः योग एक ही होता है । यह एक उत्तर दिया गया है । वायुकाय को छोड़कर चार स्थावर काय के पर्याप्त अवस्था में भी एक औदारिक काययोग कह सकते है । अंतराल गति में अनाहारक समय में कहें तो एक कार्मण काययोग कहा जा सकता है । यहां यह जान लेना चाहिए कि कार्मण काययोग दो ही जगह होता है–अंतराल गति में और केवली समुद् घात के तीसरे , चौथे, पांचवें समय में ।

 

  • दो योग क़िसमें ? उड़ती हुई मक्खी में–औदारिक काययोग, व्यवहार भाषा ।

     उड़ती हुई मक्खी पर्याप्त ही होती है अतः औदारिक के साथ व्यवहार भाषा है । पर्याप्त विकलेन्द्रिय एवं असंज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय पर्याप्त में भी ये दो योग कह सकते है ।

 

  • तीन योग क़िसमें ? तेजसकाय में–औदारिक, औदारिकमिश्र, कार्मण काययोग ।

वायुकाय को छोड़कर चार स्थावर काय में ये तीन योग कह सकते है । यहां पर्याप्त अपर्याप्त दोनों प्रकार के स्थावर जीवों की गणना है । अंतराल गति में कार्मण काययोग है और औदारिकमिश्र काययोग जब तक शरीर पर्याप्ति पूर्ण नहीं होती है तब तक रहता है । पर्याप्ति पूर्ण होने पर औदारिक काययोग होता है ।

 

  • चार योग क़िसमें ? द्वीन्द्रिय में–औदारिक काययोग, औदारिक मिश्र काययोग, व्यवहार भाषा और कार्मण काययोग ।

    तीन विकलेन्द्रिय और असंज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय में भी ये चार योग कहे जा सकते है । इन सबमें पर्याप्त-अपर्याप्त दोनों समझने चाहिए ।

 

  • पांच योग क़िसमें ? वायुकाय में–औदारिक काययोग, औदारिक मिश्रकाययोग, वैक्रिय काययोग, वैक्रिय मिश्र काययोग, कार्मण काययोग ।

    वायुकाय का पर्याप्त-अपर्याप्त साथ में कथन करने से पांच योग होते है । अंतराल गति की अपेक्षा से एक कार्मण काययोग । शरीर पर्याप्ति पूर्ण न हो तब तक अपर्याप्त अवस्था में कार्मण के साथ औदारिक का मिश्रण होने से औदारिक मिश्र काययोग, शरीर पर्याप्ति पूर्ण हो जाने पर औदारिक काययोग । वातूल के समय वैक्रिय शरीर होता है । वह जब तक पूरा न बने तब तक  औदारिक मिश्र काययोग होता है । पूर्ण होने पर वैक्रिय काययोग होता है । वैक्रिय से पुनः औदारिक शरीर बनाते समय जब तक वह पूर्ण न बने तब तक वैक्रिय मिश्र काययोग होता है ।

 

  • छः योग क़िसमें ? असंज्ञी में–औदारिक, औदारिक मिश्र, वैक्रिय, वैक्रिय मिश्र, व्यवहार भाषा, कार्मण ।

     असंज्ञी में एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक के सभी जीव आ जाते है ।

 

  • सात योग क़िसमें ? केवलज्ञानी में — सत्यमन, व्यवहार मन, सत्य भाषा, व्यवहार भाषा, औदारिक,  औदारिक मिश्र, कार्मण ।

     यह पाठ समुच्चय के रुप में दिया गया है । मूलतः केवलज्ञानी में योग पांच ही पाये जाते है । औदारिकमिश्र और कार्मण ये दो योग केवली समूद् घात की अपेक्षा से है ।

 

  • आठ योग क़िसमें ? तीसरे गुणस्थान में–नियमा–चार मन की, चार वचन की ।

तीसरा गुणस्थान पर्याप्त संज्ञी पंचेन्द्रिय के ही होता है । यहाँ चार मन, चार वचन की नियमा कही गई है । नियमा अर्थात निश्चित पाया जाना । प्रश्न है तीसरे गुणस्थान में मन, वचन के योग है तो काय का योग क्यों नहीं ? यहां ज्ञा तव्य है जिन जीवों के औदारिक शरीर है, उनके आठ योग के साथ औदारिक काययोग होगा । जिन जीवों के वैक्रिय शरीर है, उनके वैक्रिय काययोग होगा । ये दोनों वैकल्पिक हैं । तात्पर्य यह हुआ कि तीसरे गुणस्थान में चार मन, चार वचन-ये आठ योग तो निश्चित ही हैं । औदारिक और वैक्रिय का विकल्प है । औदारिक होगा तो वैक्रिय नहीं, वैक्रिय होगा तो औदारिक नहीं । इसलिए आठ योग की नियमा कही गई है ।

 

  • नौ योग किसमें ? परिहारविशुद्धि चारित्र में-चार मन, चार वचन, एक औदारिक ।

परिहारविशुद्धि एक विशिष्ट प्रकार की साधना है । इस साधना वाले लब्धि का प्रयोग नहीं करते । अतः औदारिकमिश्र आदि नहीं हो सकते ।

 

  • दस योग किसमें ? तीसरे गुणस्थान में-चार मन, चार वचन, औदारिक, वैक्रिय ।

तीसरा गुणस्थान संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त के ही होता है । उनके चार मन योग और चार वचन योग तो होते ही हैं । मनुष्य, तिर्यंच की अपेक्षा औदारिक काययोग है । देव और नारक की अपेक्षा वैक्रिय काययोग है । तीसरा गुणस्थान विचारों की अनिर्णीत अवस्था है । इसकी स्थिति अंतर्मुहूर्त्त की ही होती है । इस स्थिति में लब्धि का प्रयोग न होने से योग दस ही पाते हैं ।

 

  • ग्यारह योग किसमें ? नारकी तथा देवता में-चार मन, चार वचन, वैक्रिय, वैक्रियमिश्र, कार्मण ।

नारकी, देवता पर्याप्त एवं अपर्याप्त दोनों लिये गए हैं ।

 

  • बारह योग किसमें ? श्रावक में-आहारक, आहारकमिश्र एवं कार्मण को छोड़कर ।

आहारक काययोग, आहारकमिश्र काययोग केवल साधु में ही होते हैं । कार्मण काययोग अंतराल गति में होता है । श्रावक पर्याप्त होता है और व्रत धारण करने पर होता है । इसलिए वह अंतराल गति में नहीं होता ।

 

  • तेरह योग किसमें ? संज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय में-आहारक, आहारकमिश्र को छोड़कर ।

संज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय में औदारिक शरीर वाले और वैक्रिय-लब्धि संपन्न दोनों को लिया गया है

 

  • चौदह योग किसमें ? मनयोगी में-कार्मण को छोड़कर ।

कार्मण काययोग दो स्थानों में होता है । अंतराल गति में और केवली-समुद्घात में । यहां मनयोगी छठे गुणस्थानवर्ती लब्धिधारी साधु की अपेक्षा से है । वह अंतराल गति में हो नहीं सकता । इसलिए कार्मण काय योग नहीं पाता ।

 

  • पन्द्रह योग किसमें ? समुच्चय जीव में, साधु में ।

साधु छठे गुणस्थान से चौदहवें गुणस्थान तक होता है । छठें गुणस्थान में लब्धि का प्रयोग हो सकता है । उस अपेक्षा से चौदह योग और केवली समुद्घात की अपेक्षा कार्मण काययोग होता है ।

  1. नौंवा बोल –उपयोग बारह

 

  • एक उपयोग क़िसमें ? प्रथम समय के सिद्धों में–केवलज्ञान ।

     उपयोग दो प्रकार का होता है–साकार उपयोग, अनाकार उपयोग । साकार उपयोग अर्थात ज्ञान, अनाकार उपयोग अर्थात दर्शन । किसी भी वस्तु की प्राप्ति ज्ञान की स्थिति में ही होती है । सिद्धता एक विशेष उपलब्धि है । इसलिए सिद्धों के पहले समय में ज्ञान लिया गया है फिर उसके बाद दर्शन होता है । यह भी ज्ञातव्य है कि किसी भी गुणस्थान की प्राप्ति का प्रथम समय साकार उपयोग ही होता है । बिना विशेष चिंतन के गुणस्थान का परिवर्तन नही होता, इसलिए पहले ज्ञान ही होता है, बाद में दर्शन ।

 

  • दो उपयोग क़िसमें ? सिद्धों में –केवलज्ञान, केवलदर्शन ।

     केवली में भी दो उपयोग कह सकते है ।

 

  • तीन उपयोग क़िसमें ? एकेन्द्रिय में–मति अज्ञान, श्रुतअज्ञान, अचक्षुदर्शन ।

      तीन विकलेन्द्रिय,  असंज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय-अपर्याप्त में भी तीन उपयोग कह सकते है । अपर्याप्त अवस्था में यदि सास्वादन-सम्यक्त्व वाले जीव है तो उनमें मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अचक्षुदर्शन होंगे । यदि मिथ्यात्वी है तो उनमें मतिअज्ञान, श्रुतअज्ञान, अचक्षुदर्शन होंगे । पर्याप्त अवस्था में तो ये जीव मिथ्यात्वी ही होंगे ।

 

  • चार उपयोग क़िसमें ? दसवें गुणस्थान ने -चार जिसन (केवलज्ञान को छोड़कर) ।

     दसवें गुणस्थान की स्थिति कम है, उसका अंतर्मुहूर्त छोटा है । वह ज्ञान में आता है और दर्शन आने से पहले ही अगला गुणस्थान प्राप्त हो जाता है । पर्याप्त चतुरिन्द्रिय में भी चार उपयोग कह सकते है । वहां मतिअज्ञान, श्रुत अज्ञान, चक्षु दर्शन, अचक्षुदर्शन पाएंगे ।

 

  • पांच उपयोग क़िसमें ? द्विन्द्रिय में –मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, मति अज्ञान, श्रुतअज्ञान, अचक्षुदर्शन ।

    तीन विकलेन्द्रिय तथा असंज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय में भी पांच उपयोग कह सकते है । यह कथन सास्वादन सम्यक्त्व की अपेक्षा से है । अपर्याप्त अवस्था में सास्वादन सम्यक्त्व हो तो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान हो सकता है । सम्यक्त्व न हो तो मति अज्ञान, श्रुत अज्ञान होता है । इस दृष्टि से पांच उपयोग लिए गए है ।

 

  • छह उपयोग क़िसमें ? मिथ्यात्वी में–तीन अज्ञान, तीन दर्शन ।

      अनुत्तर विमान के देव सम्यक्त्व ही होते है इसलिए उनमें छह उपयोग कहे तो तीन ज्ञान, तीन दर्शन कह सकते है ।

     चतुरिन्द्रिय में भी पर्याप्त-अपर्याप्त दोनों का साथ कथन करें तो दो ज्ञान, दो अज्ञान, दो दर्शन कह सकते है ।

 

  • सात उपयोग क़िसमें ? छठे गुणस्थान में –चार ज्ञान, तीन दर्शन ।

      छठे से बारहवें गुणस्थान तक ये सात उपयोग कह सकते है ।

 

  • आठ उपयोग क़िसमें ? अचरम में — तीन अज्ञान, केवलज्ञान, चार दर्शन ।

      अचरम अर्थात जिनका अपनी अवस्था से अंत नहीं होगा । अभव्य का संसार से अंत नहीं होगा । सिद्धों का सिद्ध गति से अंत नहीं होगा । इस दृष्टि से अचरम में अभव्य और सिद्ध दोनों का समावेश है । अभव्य की अपेक्षा तीन अज्ञान, तीन दर्शन, सिद्धों की अपेक्षा केवलज्ञान, केवलदर्शन । इस प्रकार अचरम में आठ उपयोग हुए ।

 

  • नौ उपयोग क़िसमे ? नारक, देवता में–मनः पर्यवज्ञान, केवलज्ञान, केवल दर्शन को छोड़कर ।

     संज्ञी तिर्यंच में भी नौ कह सकते है ।

 

  • दस उपयोग क़िसमें ? स्त्री वेदी में –केवल ज्ञान, केवल दर्शन को छोड़कर ।

     सवेदी, सकषाय और छद्मस्थ में भी ये दस उपयोग कह सकते है ।

 

  • ग्यारह उपयोग क़िसमें ? अभाषक में–मनः पर्यावज्ञान को छोड़कर ।

     कोई प्राणी अगले जन्म में संज्ञी पंचेन्द्रिय के रूप में उत्पन्न होनेवाला हो वह जब तक भाषा पर्याप्ति नहीं बांधता तब तक अभाषक ही माना जाता है । उस अवस्था में यदि सम्यक्त्वी है तो तीन ज्ञान, मिथ्यात्वी है तो तीन अज्ञान और इन्द्रिय पर्याप्ति बंध चुकी इसलिए तीन दर्शन – ये नौ उपयोग हो गए । चौदहवां गुणस्थान अभाषक है, सिद्ध भी अभाषक है । उनकी अपेक्षा केवलज्ञान, केवलदर्शन हो गया ।

 

  • बारह उपयोग क़िसमें ? समुच्चय जीव में । मनुष्य में ।

     मनुष्य मिथ्यात्वी से लेकर केवलज्ञान की भूमिका तक पहुंच जाता है इसलिए उसमें सभी उपयोग पाए जा सकते है ।

  1. दसवां बोल -कर्म आठ

 

  • एक, दो, तीन कर्म क़िसमें ? किसी में नही ।
  • चार कर्म क़िसमें ? केवली में — वेदनीय, नाम, गोत्र, आयुष्य ।
  • पांच कर्म क़िसमें ? किसी में नहीं ।
  • सात कर्म क़िसमें ? बारहवें गुणस्थान में (मोहनीय कर्म को छोड़कर)
  • आठ कर्म क़िसमें ? समुच्चय जीव में/सकषायी में ।

     यह बोल स्वतः स्पष्ट है ।

  1. ग्यारहवां बोल – गुणस्थान चौदह

 

  • एक गुणस्थान क़िसमें ? एकेन्द्रिय में पहला ।

     मिथ्यात्वी, अभवी,  पांच स्थावर, असंज्ञी मनुष्य में भी पहला गुणस्थान कहा जा सकता है । वैसे सबमें अपना अपना एक गुणस्थान ही पाता है । जैसे मिश्रदृष्टि में एक तीसरा गुणस्थान, अव्रती श्रावक में चौथा गुणस्थान, व्रती श्रावक में पांचवां गुणस्थान, प्रमतसंयत में छठा गुणस्थान ।

 

  • दो गुणस्थान क़िसमें ? द्विन्द्रिय में–पहला, दूसरा ।

      तीन विकलेन्द्रिय तथा असंज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय में पर्याप्त-अपर्याप्त की अपेक्षा प्रथम दो गुणस्थान कह सकते है । केवली में कहे तो अंतिम दो गुणस्थान कह सकते है ।

 

  • तीन गुणस्थान क़िसमें ? अपर्याप्त में–पहला, दूसरा, चौथा ।

    अपर्याप्त अवस्था में जीव या मिथ्यात्वी होता है या सम्यक्त्वी होता है । मिथ्यात्वी में पहला गुणस्थान, सम्यक्त्वी में चौथा गुणस्थान । ये पूर्व भव् से लेकर आते है । उपशम सम्यक्त्व से गिरते समय प्राणी का आयुष्य पूर्ण हो जाए तो अपर्याप्त अवस्था में सास्वादन सम्यक्त्व की प्राप्ति की अपेक्षा दूसरा गुणस्थान लिया गया है ।

   क्षायिक चारित्र में अंतिम तीन गुणस्थान कह सकते है ।

 

 

  • चार गुणस्थान क़िसमें ? देवता में –प्रथम चार गुणस्थान ।

    नारक में एवं अव्रती में भी कह सकते है ।

     यथाख्यात चारित्र में कहें तो अंतिम चार गुणस्थान कह सकते है ।

 

  • पांच गुणस्थान क़िसमें ? संज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय में–प्रथम पांच गुणस्थान ।

     संपूर्ण अवेदी में कहें तो अंतिम पांच गुणस्थान कह सकते है

    नौंवा गुणस्थान सवेदी और अवेदी दोनों में होता है । प्रारम्भ में नौंवा गुणस्थान सवेदी होता है औऱ बाद में अवेदी होता है । इसलिए वह संपूर्ण अवेदी नहीं कहा जा सकता है ।

 

  • छह गुणस्थान क़िसमें ? कृष्ण लेश्या में –प्रथम छह गुणस्थान ।

     सातवें गुणस्थान में कृष्ण लेश्या नहीं रहती ।

     प्रमादी में भी कह सकते है ।

     अवेदी में कहें तो अंतिम छह कह सकते है । नौंवा गुणस्थान अंत में अवेदी होता है इसलिए उसे अवेदी में ले लिया है ।

 

  • सात गुणस्थान क़िसमें ? तेजोलेश्या में–प्रथम सात ।

     पद्म लेश्या में भी कह सकते है । आठवें गुणस्थान से लेकर शुक्ल लेश्या ही होती है ।

    

  • आठ गुणस्थान क़िसमें ? अप्रमादी में–अंतिम आठ गुणस्थान ।

     प्रथम छह गुणस्थान तक प्रमाद होता है ।

 

  • नौ गुणस्थान क़िसमें ? स्त्रीवेद में –प्रथम नौ ।

      नौंवे गुणस्थान तक तीनों वेद होते है । अतः सवेदी में कह सकते है ।

 

  • दस गुणस्थान क़िसमें ? लोभकषायी में–प्रथम दस ।

     दसवें से आगे कषाय नहीं होता ।

      संवर धर्म में भी अंतिम दस कह सकते है । संवर धर्म प्रथम चार गुणस्थानों में नहीं होता । त्याग की क्षमता पांचवे गुणस्थान से शुरू होती है

 

  • ग्यारह गुणस्थान क़िसमें ? चक्षुदर्शन में–10, 13, 14 छोड़कर ।

    दसवें गुणस्थान में दर्शन के उपयोग नहीं पाते, ज्ञान के ही पाते है । तेरहवें,  चौदहवें गुणस्थान में केवलज्ञान, केवलदर्शन दो उपयोग ही होते है । अतः इन तीन गुणस्थानों को छोड़ा गया है । दूसरी अपेक्षा से कहे तो चक्षुदर्शन दर्शनावरणीय कर्म के क्षयोपशम से प्राप्त होता है । अंतिम दो गुणस्थानों में दर्शनावरणीय कर्म का क्षायिक भाव है ।

     क्षायिक सम्यक्त्वी में कहे तो अंतिम ग्यारह गुणस्थान कह सकते है । क्षायिक सम्यक्त्व चौथे गुणस्थान से हो सकता है ।

   

  • बारह गुणस्थान क़िसमें ? सम्यक्त्वी में–1 और 3 को छोड़कर ।

    ये दो गुणस्थान मिथ्यात्वी में पाते है । छद्मस्थ में कहें तो प्रथम बारह गुणस्थान कह सकते है । तेरहवां चौदहवां गुणस्थान केवली में ही पाता है ।

  • तेरह गुणस्थान क़िसमें ? सयोगी में–14वां छोड़कर ।

    चौदहवां गुणस्थान अयोगी है ।

  • चौदह गुणस्थान क़िसमें ? समुच्चय जीव में, मनुष्य में ।

    मनुष्य में सभी गुणस्थान पाए जाते है ।

  1. बारहवां

 

      पांच इन्द्रियों के 23 विषय ।

  • आठ विषय एकेन्द्रिय में–आठ स्पर्श
  • तेरह विषय द्विन्द्रिय में–पांच रस, आठ स्पर्श ।
  • पन्द्रह विषय त्रिन्द्रिय में–दो घ्राण, पांच रस, आठ स्पर्श ।
  • बीस विषय चतुरिन्द्रिय में–श्रोत्रेन्द्रिय के तीन विषय छोड़कर ।
  • तेईस विषय पंचेन्द्रिय में ।
  1. तेरहवां बोल

 

  दस प्रकार का मिथ्यात्व ।

  • मिथ्यात्व के प्रकार क़िसमें ? मिथ्यात्वी जीव में ।
  1. चौदहवां बोल–जीव के 14 भेद

 

  • एक भेद क़िसमें ? केवलज्ञानी में–चौदहवां ।

    एक भेद सभी में अपना अपना पाता है । साधु हो, श्रावक हो, पर्याप्त हो, अपर्याप्त हो सबमें अपना अपना एक भेद कहा जा सकता है ।

 

  • दो भेद क़िसमें ? देवता में–तेरहवां, चौदहवां ।

     नारक में, संज्ञी तिर्यंच में, संज्ञी मनुष्य में भी कह सकते है । वैसे अपने अपने कहे जाए तो सबमें दो दो ही पाते है । जैसे–सूक्ष्म एकेन्द्रिय में प्रथम दो, बादर एकेन्द्रिय में तीसरा, चौथा, द्विन्द्रिय में पांचवां छठा, इसी तरह अन्यत्र भी कहे जा सकते है ।

 

  • तीन भेद क़िसमें ? मनुष्य में 11, 13, 14

    ग्यारहवां भेद असंज्ञी मनुष्य का, शेष दो संज्ञी मनुष्य के है । असंज्ञी मनुष्य अपर्याप्त ही होता है । पर्याप्त होने से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । इसलिए बारहवां भेद नहीं पाया जाता है ।

 

  • चार भेद क़िसमें ? एकेन्द्रिय में–प्रथम चार ।

     पंचेन्द्रिय में कहे तो अंतिम चार कह सकते है ।

 

  • पांच भेद क़िसमें ? भाषक में–6, 8, 10, 12, 14

     जिन जीवों को रसनेन्द्रिय प्राप्त हो जाती है तथा जो पर्याप्त बन जाते है वे भाषक कहलाते है । इस दृष्टि से द्विन्द्रिय से पंचेन्द्रिय तक पर्याप्त के पांचों भेद लिए गए है ।

    ये पांच भेद त्रस के पर्याप्त में भी कह सकते है ।

    त्रस के अपर्याप्त में भी पांच भेद पाए जाते है–5, 7, 9, 11, 13

 

  • छह भेद क़िसमें ? सम्यक्तवी में –5, 7, 9, 11, 13, 14

     पांच त्रस के अपर्याप्त सास्वादन सम्यक्त्वी की अपेक्षा से और चौदहवां पर्याप्त है ।

 

  • सात भेद क़िसमें ? पर्याप्त में–सात पर्याप्त के 2, 4, 6, 8, 10, 12, 14

    अपर्याप्त में –सात अपर्याप्त के कह सकते है–1, 3, 5, 7, 9, 11, 13

 

  • आठ भेद क़िसमें ? अनाहारक में –सात अपर्याप्त के एवं चौदहवां ।

     अपर्याप्त के बोल जब अंतराल गति होती है तब कार्मण योग के समय होते है । चौदहवां भेद केवली समुद् घात एवं चौदहवें गुणस्थान की अपेक्षा अनाहारक होता है ।

 

  • नौ भेद क़िसमें ? औदारिक मिश्र में–2, 6, 8, 10, 12 छोड़कर ।

     सात भेद अपर्याप्त अवस्था के है । अपर्याप्त अवस्था में तिर्यंच एवं मनुष्य गति में उत्पन्न होने के समय जीव आहार ले लेता है परंतु औदारिक शरीर का बंध पूर्ण नहीं हो पाता तब तक कार्मण योग के साथ औदारिक मिश्र होता है । चौथा भेद वायुकाय की अपेक्षा से है ।

      बादर वायुकाय वैक्रिय रूप बनाती है परंतु जब तक वह पूर्ण नहीं होता तब तक वैक्रिय काययोग के साथ औदारिक मिश्र काययोग होता है । चौदहवां भेद वैक्रिय लब्धिधारी मनुष्य तिर्यंचों की अपेक्षा से है । जब वे वैक्रिय रूप बनाते है परंतु जब तक वह पूर्ण नहीं बनता तब तक वैक्रिय काययोग के साथ औदारिक मिश्र काययोग होता है । इस दृष्टि से औदारिक मिश्र में नौ योग पाये गए है ।

      ज्ञातव्य है कि दूसरा भेद पर्याप्त वायुकाय में पाता है पर वह सूक्ष्म एकेन्द्रिय का भेद है । सूक्ष्म वायुकाय वैक्रिय रूप नहीं बना सकती । तीन विकलेन्द्रिय और असंज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय के वैक्रिय लब्धि नहीं होती । अतः ये पांच भेद छोड़े गए है ।

 

  • दस भेद क़िसमें ? त्रसकाय में–एकेन्द्रिय के चार छोड़कर ।

    एकेन्द्रिय स्थावर है ।

 

  • ग्यारह भेद क़िसमें ? केवल तिर्यंच में–11, 13, 14 को छोड़कर ।

     तिर्यंच में जीव के सभी भेद पाते है पर यहाँ केवल तिर्यंच की बात कही है इसलिए तीन भेद छोड़े गए है । ये तीन भेद तिर्यंच के अतिरिक्त दूसरे जीवों में भी पाए जाते है ।

      ग्यारहवां भेद असंज्ञी मनुष्य में पाता है । तेरहवां, चौदहवां भेद संज्ञी मनुष्य,  नारक, देव सबमें पाता है । इस दृष्टि से इन्हें छोड़ा गया है ।

 

  • बारह भेद क़िसमें ? असंज्ञी में –13, 14 को छोड़कर ।

     ये दोनों भेद संज्ञी में ही होते है ।

 

  • तेरह भेद क़िसमें ? केवल असंयती में–14 वां छोड़कर

      असंयति में जीव के सभी भेद पाए जाते है पर यहाँ केवल असंयति की बात कही है । अतः चौदहवां भेद छोड़ा गया है । यह भेद संयति, असंयति दोनों में पाया जाता है ।

 

  • चौदह भेद क़िसमें ? समुच्चय जीव में, तिर्यंच में ।



  1. पंन्द्रहवां बोल–आत्मा आठ

 

  • एक आत्मा किसमें ? द्रव्य जीव में–द्रव्य आत्मा ।

      यह भेद असंख्य प्रदेशात्मक शुद्ध जीव द्रव्य की अपेक्षा से है ।

 

  • दो आत्मा किसमें ? उपशम भाव में–दर्शन, चारित्र ।

      उपशम मोहनीय कर्म का ही होता है ।  दर्शन मोहनीय कर्म के उपशम की अपेक्षा दर्शन आत्मा,  चारित्र मोहनीय कर्म के उपशम की अपेक्षा चरित्र आत्मा ।  संपूर्ण उपशम भावात्मक–यह दो आत्माएं ही हो सकती हैं ।

 

  • तीन आत्मा किसमें ? उदय भाव में–कषाय, योग, दर्शन ।

      ये तीन आत्माएं ही उदय भाव वाली है ।  तीनों का संबंध मोहनीय कर्म के उदय के साथ है ।

 

  • चार आत्मा किसमें ? सिद्धों में–द्रव्य, उपयोग,  ज्ञान , दर्शन ।

 

  • पांच आत्मा किसमें? निर्जरा में–द्रव्य, कषाय, चरित्र को छोड़कर ।

      द्रव्य आत्मा शुद्ध आत्माद्रव्य है ।  कषाय आश्रव का हेतु है,  चारित्र संवर का हेतु है ।  अतः यह तीन आत्माएं निर्जरा का हेतु नहीं होतीं ।

 

  • छह आत्मा किसमें ? मिथ्यात्वी में–ज्ञान, चारित्र को छोड़कर ।

       मिथ्यात्वी में ज्ञान का प्रकाश नहीं और व्रत भी नहीं, आत्मा छह ही हैं । ये छह आत्मा असंज्ञी में भी कह सकते हैं ।

      अलेश्यी और अयोगी में छह आत्मा कहें तो कषाय और योग आत्मा को छोड़कर कह सकते हैं ।  यह अवस्था चौदहवें गुणस्थान में होती है ।

 

  • सात आत्मा किसमें ? श्रावक में– चारित्र को छोड़कर ।

       श्रावक में पूर्ण चारित्र के अभाव में चारित्र आत्मा नहीं ली गयी है ।

       नारक में, देवों में, चौथे गुणस्थान में भी ये सात आत्माएं कह सकते हैं ।

 

  • आठ आत्मा किसमें ? साधु में ।

       छठे से दसवें गुणस्थान तक साधु में सभी आत्माएं हैं ।  दसवें गुणस्थान से पहले कषाय आत्मा नहीं छूटती ।

  1. सोलहवां बोल–दण्डक चौबीस

 

  • एक दण्डक क़िसमें ? सात नारकी में ।

    अपना अपना दण्डक सभी जीवों में एक ही कह सकते है ।

 

  • दो दण्डक क़िसमें ? श्रावक में–20, 21

     तिर्यंच एवं मनुष्य दोनों श्रावक हो सकते है ।

 

  • तीन दण्डक क़िसमें ? शुक्ललेश्या में –20, 21, 24

     मनुष्य एवं तिर्यंच में शुक्ललेश्या होती है । छठे देवलोक से शुक्ललेश्या होती है । अतः तीन दण्डक लिए गए है ।

 

  • चार दण्डक क़िसमें ? तिर्यंच-त्रसकाय में–17, 18, 19, 20

     तिर्यंच-त्रसकाय दोनों के साथ कथन करने में ये चार दण्डक पाए जाते है । केवल तिर्यंच या केवल त्रसकाय में नहीं ।

 

  • पांच दण्डक क़िसमें ? एकेन्द्रिय में–12, 13, 14, 15, 16

   एकेन्द्रिय में ये पांच ही दण्डक पाते है ।

 

  • छह दण्डक क़िसमें ? त्रसकाय- नपुंसक में–1, 17, 18, 19, 20, 21

    त्रसकाय और नपुंसक दोनों के एक साथ कथन में–ये छह दण्डक पाए जाते है । इन छह दंडको के जीव त्रसकाय भी है, नपुंसक भी है ।

 

  • सात दण्डक क़िसमें ? केवल अचक्षुदर्शन में–12, 13, 14, 15, 16, 17, 18

   अचक्षुदर्शन सब जीवों में पा सकता है, पर केवल अचक्षुदर्शन वाले जीव एकेन्द्रिय, द्विन्द्रिय एवं त्रिन्द्रिय वाले ही होते है ।

 

  • आठ दण्डक क़िसमें ? केवल असंज्ञी में–12, 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19

    एकेन्द्रिय से लेकर चतुरिन्द्रिय तक के जीव केवल असंज्ञी ही होते है, इसलिए उनमें आठ दण्डक लिए गए है ।

 

  • नौ दंडक क़िसमें ? तिर्यंच में–12 से 20

     ये नौ दण्डक केवल तिर्यंच में ही पाये जाते है ।

 

  • दस दण्डक क़िसमें ? असंज्ञी में –12 से 21

    12 से 19 तक के दण्डक तो असंज्ञी ही है । बीसवां,  इक्कीसवां दण्डक संज्ञी, असंज्ञी–दोनों में होता है ।

 

  • ग्यारह दण्डक क़िसमें ? नपुंसक वेद में–13 देवता के छोड़कर ।

    देवता नपुंसक नहीं होते, इसलिए उन्हें छोड़ा गया है । नारक नपुंसक ही होते है । मनुष्य, तिर्यंच में तीनों वेद होते है ।

 

  • बारह दण्डक क़िसमें ? गर्भ बिना के संज्ञी कृष्णलेश्यी में–1 से 11, 22 वां ।

    गर्भ बिना के , संज्ञी और कृष्णलेश्यी–ये तीनो शर्ते जहां एक साथ घटित हों उन जीवों में बारह दण्डक लिए गए है । बारहवें से उन्नीसवें दण्डक वाले जीव तो असंज्ञी ही होते है । इसलिए उनका ग्रहण नहीं किया गया । बीसवां,  इक्कीसवां दण्डक संज्ञी तो होता है पर गर्भज होता है, इसलिए उनका ग्रहण नहीं किया गया । तेइसवां, चौबीसवां दण्डक गर्भ बिना के भी है, संज्ञी भी है, पर कृष्णालेश्यी नहीं, इसलिए उनका ग्रहण नहीं किया गया है ।

 

  • तेरह दण्डक क़िसमें ? देवता में–2 से 11 तक 22, 23, 24, वां ।

    ये तेरह दण्डक केवल देवों में ही पाते है ।

 

  • चौदह दण्डक क़िसमें ? केवल संज्ञी में–13 देवता के, एक नारकी का ।

    बारहवें से उन्नीसवें दण्डक तक के जीव तो असंज्ञी ही होते है । मनुष्य व् तिर्यंच पंचेन्द्रिय संज्ञी-असंज्ञी दोनों होते है, इसलिए उनका ग्रहण नही है । नारक, देव संज्ञी ही होते है, इसलिए उनका ग्रहण किया गया है ।

 

  • पन्द्रह दण्डक क़िसमें ? स्त्रीवेद में –13 देवता के 20, 21

    देव, संज्ञी तिर्यंच व संज्ञी मनुष्य में स्त्रीलिंग होता है इसलिए ये दण्डक लिए गए है । शेष दंडको में स्त्रीवेद नहीं होता ।

 

  • सोलह दण्डक क़िसमें ? संज्ञी में –5 स्थावर, 3 विकलेन्द्रिय छोड़कर ।

    पांच स्थावर, तीन विकलेन्द्रिय–ये आठ दण्डक असंज्ञी ही होते है इसलिए इन्हें छोड़ा गया है ।

 

  • सत्रह दण्डक क़िसमें ? चक्षुदर्शन में –पांच स्थावर, द्विन्द्रिय, त्रिन्द्रिय को छोड़कर ।

    इन सात दंडको में चक्षुदर्शन नहीं होता ।

 

  • अठारह दण्डक क़िसमें ? तेजोलेश्या में–3 विकलेन्द्रिय, नारक, तैजस,  वायु को छोड़कर ।

    इन दंडको में लेश्याएं तीन अशुभ ही होती है, इसलिए छोड़ा गया है ।

 

  • उन्नीस दण्डक क़िसमें ? सम्यक्त्वी में–5 स्थावर छोड़कर ।

      पांच स्थावर जीवों में सम्यक्त्व नहीं होती ।

 

  • बीस दण्डक क़िसमें ? अढाई द्वीप के बाहर नीचे लोक में –21, 22, 23, 24 छोड़कर ।

     इक्कीसवां दण्डक मनुष्य का है । मनुष्य नीचे लोक में है पर अढाई द्वीप के बाहर नहीं है, इसलिए छोड़ा गया है । बाइसवां दण्डक तिर्यक लोक में है और तेइसवां, चौबीसवां दण्डक ऊर्ध्व लोक में है इसलिए इन्हें छोड़ा गया है ।

 

  • इक्कीस दण्डक क़िसमें ? नीचे लोक में — 22, 23, 24 छोड़कर ।

     बाइसवां दण्डक तिर्यक लोक में है । तेइसवां, चौबीसवां दण्डक ऊर्ध्व लोक में है, इसलिए इन्हें छोड़ा गया है ।

 

 

  • बाइस दण्डक क़िसमें ? कृष्णलेश्या में–23, 24 छोड़कर ।

     इन दो दंडको में कृष्णलेश्या नहीं पाती । तेइसवें दण्डक में केवल तेजोलेश्या पाती है और चौबीसवें दण्डक में तीन शुभ लेश्याएं पाती है ।

 

  • तेईस दण्डक क़िसमें ? एकेन्द्रिय की आगत में–नारक का दण्डक छोड़कर ।

    एकेन्द्रिय की आगत अर्थात एकेन्द्रिय में आकर उत्पन्न होने वाले जीव । नारक जीव नारकी से निकलकर एकेन्द्रिय में नहीं आते । इसलिए नारकी का दण्डक छोड़ा है ।

 

  • चौबीस दण्डक क़िसमें ? अव्रती में ।

    अव्रती सभी दण्डक के जीव होते है ।

  1. सतरहवा बोल–लेश्या छह

 

  • एक लेश्या किसमे ? तेरहवें गुणस्थान में–शुक्ललेश्या ।

आठवें गुणस्थान से भी शुक्ललेश्या कह सकते हैं ।

छठे देवलोक से सर्वार्थसिद्ध तक भी एक शुक्ल लेश्या कह सकते हैं ।

छठी,  सातवीं नरक में कहें तो एक कृष्णलेश्या कह सकते हैं ।

 

  • दो लेश्या किसमें ? तीसरी नरक में–कापोत, नील ।

पाँचवीं नरक में कृष्ण, नील दो कह सकते हैं ।

 

  • तीन लेश्या किसमें ? तैजसकाय में–कृष्ण, नील,  कापोत ।

वायुकाय, तीन विकलेन्द्रीय, असंज्ञी तिर्यच पंचेन्द्रीय एवं असंज्ञी मनुष्य में भी ये तीन लेश्याएं कह सकते हैं ।

 

  • चार लेश्या किसमें ? पृथ्वीकाय में–पद्म, शुक्ल को छोड़कर ।

भवनपति, व्यंतर, अप्काय,  वनस्पतिकाय तथा सर्व यौगलिक में भी ये चार लेश्याएं कह सकते हैं ।

 

  • पांच लेश्या किसमें ? संन्यासी की गति देवता में–शुक्ललेश्या को छोड़कर ।

संन्यासी (गैरिक, तापस आदि) मृत्यु को प्राप्त कर देवलोक जाय तो भवनपति से लेकर पांचवे देवलोक तक जा सकते हैं ।  शुक्ललेश्या छठे देवलोक से शुरू होती है ।

 

  • छह लेश्या किसमें ? समुच्चय जीव में ।

प्रमादी में भी छह लेश्याएं हैं । प्रारंभ के छह गुणस्थानों तक छह लेश्याएं पाई जाती हैं ।

  1. अठारहवां बोल — दृष्टि तीन

 

  • एक दृष्टि क़िसमें ? चौथे गुणस्थान में–सम्यकदृष्टि ।

    चौथे गुणस्थान से आगे सभी गुणस्थानों में एक सम्यक दृष्टि कह सकते है । मिथ्यात्वी या अभव्य में कहें तो एक मिथ्यादृष्टि कह सकते है ।

 

  • दो दृष्टि क़िसमें ? द्विन्द्रिय में–सम्यक दृष्टि, मिथ्यादृष्टि ।

    विकलेन्द्रिय, असंज्ञी तिर्यंच पंचेन्द्रिय,  तीस अकर्मभूमि के यौगलिक में एवं नौ ग्रेवेयक में भी दो दृष्टि कह सकते है ।

 

  • तीन दृष्टि क़िसमें ? समुच्चय जीव में ।

   संज्ञी में तीनों दृष्टि कह सकते है ।

 

  1. उन्नीसवां बोल –ध्यान चार
  • एक ध्यान क़िसमें ? केवल ज्ञानी में–शुक्लध्यान ।

 

  • दो ध्यान क़िसमें ? साठवें गुणस्थान में-धर्मध्यान, शुक्लध्यान ।

      शुक्लध्यान की योग्यता साठवें गुणस्थान में आ जाती है इसलिए सातवें में शुक्लध्यान ले लिया गया है । वैसे चिंतन आठवें गुणस्थान से ही शुरू होता है । आठवें से बारहवें गुणस्थान तक शुक्लध्यान का प्रथम भेद , तेरहवें गुणस्थान में जाते समय दूसरा भेद, तेरहवें से चौदहवें गुणस्थान में जाते समय शुक्लध्यान के अंतिम दो भेद पाते है ।

 

  • तीन ध्यान क़िसमें ? श्रावक में–शुक्लध्यान को छोड़कर ।

     पहले से छठे गुणस्थान तक ध्यान तीन पाते है ।

 

  • चार ध्यान क़िसमें ? समुच्चय जीव में ।
  1. बीसवां बोल–षड्द्रव्यों का ज्ञान

 

  • एक द्रव्य क़िसमें ? अलोक में–आकाशस्तिकाय ।

 

  • दो द्रव्य क़िसमें ? गतिशील पदार्थो में –जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय ।

     गतिशील पदार्थ जीव और पुद्गल दो ही होते है ।

 

  • तीन द्रव्य क़िसमें ? अरूपी-अजीव-अस्तिकाय में–धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशस्तिकाय ।

     ये तीनों अरूपी भी हैं,  अजीव भी हैं और अस्तिकाय भी है । काल अरूपी और अजीव है पर अस्तिकाय नहीं है । पुद्गल अजीव है, अस्तिकाय है पर अरूपी नहीं है । जीव अरूपी और अस्तिकाय है पर अजीव नहीं है इसलिए काल, पुद्गल और जीव को नहीं लिया गया है ।

 

  • चार द्रव्य क़िसमें ? अरूपी-अजीव में पुद्गल एवं जीव को छोड़कर ।

      पुद्गल अजीव होता है पर रूपी होता है । जीव अरूपी होता है पर अजीव नहीं होता इसलिए ये दोनों द्रव्य छोड़े गए है ।

 

  • पांच द्रव्य क़िसमें ? अजीव में–जीवास्तिकाय को छोड़कर ।

      जीवास्तिकाय जीव ही होती है ।

 

  • छह द्रव्य क़िसमें ? लोक में ।

        अलोक में केवल एक आकाशस्तिकाय ही होता है ।

  1. इक्कीसवां बोल–राशि दो
  • एक राशि किसमें ? जीव में जीव राशि, अजीव में–अजीव राशि ।

   ●दो राशि किसमें ?  लोक में ।

  1. बाईसवां बोल श्रावक के–व्रत बारह
  • व्रत किसमें ?  श्रावक में ।

   यहाँ व्रतधारी श्रावक ही लिया गया है ।

  1. तईसवां बोल- साधु के महाव्रत पांच
  • महाव्रत किसमें ? साधु में । स्पष्ट है ।
  1. चौबीसवां बोल- भांगा उनपचास
  • भांगा किसमें ? त्याग के अनुसार पाते है । स्पष्ट है ।
  1. पच्चीसवां बोल- चारित्र पांच

 

  • एक चारित्र किसमें ? केवलज्ञानी में – यथाख्यात चारित्र ।

वीतराग में भी कहा सकते है । दसवें गुणस्थान में भी एक सूक्ष्म संपराय चारित्र कह सकते हैं । एक-एक चारित्र अपना अपना भी कह सकते हैं ।

 

  • दो चारित्र किसमें ? पुलाक निर्ग्रन्थ में सामायिक, छेदोपस्थापनीय ।

पुलाक निर्ग्रन्थ सभी तीर्थंकरों के समय में हो सअकते हैं । इसलिए इनमें दो चारित्र लिये गये हैं ।

 

 

  • तीन चारित्र किसमें ? छ्ठे गुणस्थान में – सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धि चारित्र ।

महाविदेह में तीन चारित्र कहें तो सामायिक, सूक्ष्मसंपराय, यथाख्यात चारित्र कह सकते हैं । छेदोपस्थापनीय और परिहारविशुद्धि वहां नहीं पाये जाते ।

 

  • चार चारित्र किसमें ? लोभ कषाय में – यथाख्यात को छोड़कर ।

यथाख्यात चारित्र ग्यारहवें गुणस्थान से होता है । लोभ कषायी दसवें गुणस्थान तक होता है ।

 

  • पांच चारित्र किसमें ? साधु में

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