25 Bol (पच्चीस बोल)

नोट:- तत्त्वज्ञान भाग-1 में 25 बोल का सिर्फ कंठस्थ वाला भाग ही आयेगा । इसका जो विवरण दिया जा रहा है वो सिर्फ समझने के लिए दिया जा रहा है ।

(१) पहला बोल : गति चार

गति: गति शब्द का अर्थ हैं- एक जन्म स्थिति से दूसरी जन्म स्थिति को या एक अवस्था से दूसरी अवस्था को पाने के अर्थ में हुआ है । जैसे मनुष्य अवस्था में जीव मनुष्य गति कहलाता है और वही जीव तिर्यंच-अवस्था को प्राप्त हो गया तो हम उसे तिर्यंच्च- गति कहेंगे । गति के चार प्रकार हैं-

(१) नरक गति- नरक सात हैं- रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमप्रभा, महातमप्रभा ये सात पृथ्विया नीचे लोक में हैं ।इनमें जो जीव उत्पन्न होते हैं, वे नारक कहलाते हैं ।

(२) तिर्यंच्च गति- एक,दो,तीन,चार इन्द्रिय वाले जीव तथा पांच इन्द्रिय वाले स्थलचर- भूमि पर चलने वाले, खेचर- आकाश में उड़ने वाले तथा जलचर- पानी में रहने वाले सभी जीव तिर्यंच कहलाते हैं ।

(३) मनुष्य गति- मनुष्य की अवस्था को प्राप्त करना मनुष्य गति है । मनुष्य दो प्रकार के होते हैं- संज्ञी अौर असंज्ञी । जिन मनुष्यो के मन होता है वे संज्ञी कहलाते है और जिनके मन नहीं होता,वे असंज्ञी कहलाते है । संज्ञी मनुष्य गर्भ से उत्पन्न होते हैं और असंज्ञी मनुष्य मनुष्य जाति के मल,मूत्र,शलेष्म आदि चौदह स्थानों से पैदा होते है । ये बहुत सूक्ष्म होते हैं,इसलिए हमे दिखाई नहीं देते ।

(४) देव गति- जो जीव देव योनि में पैदा होते हैं वे देव गति है । देवता चार तरह के होते हैं- भवनपति, व्यंतर,ज्योतिष्क,वैमानिक ।

सभी संसारी जीव अपने किए हुए कर्मो के अनुसार एक गति में से दूसरी गति में परिवर्तित होते रहते हैं ।जैसे एक ही जीव कभी मनुष्य,कभी देवता,कभी तिर्यंच और कभी नारक बन जाता है ।

(२) दूसरा बोल: जाति पांच

जाति: इन्द्रियों (त्वचा,जिह्वा,नाक, आँख और कान) के द्वारा जो जीव के विभाग होते है,उसे जाति कहते हैं,जाति शब्द का अर्थ सदृशता है; जैसे- गाय जाति,अश्व जाति । जाति के पांच प्रकार हैं-

 

(१) एकेंद्रिय- जिन जीवों के केवल एक स्पर्शन इन्द्रिय होती हैं,उन जीवों की जाति है- एकेंद्रिय । पृथ्वी,पानी, अग्नि,वायु, वनस्पति आदि ।

(२) द्वीन्द्रिय-जिन जीवों के स्पर्श तथा रसन- ये दो इन्द्रियां होती है,उन जीवों की जाति हैं- द्वीन्द्रिय । लट,सीप,शंख,कृमि, घुन आदि।

(३) त्रीन्द्रिय- जिन जीवों के स्पर्शन, रसन तथा घ्राण- ये तीन इन्द्रियां होती हैं, उन जीवों की जाति है- त्रीन्द्रिय । चीन्टी,मकोड़ा, जूं, लीख, चिचड़ आदि ।

(४) चतुरिंद्रिय- जिन जीवों के स्पर्शन, रसन, घ्राण तथा चक्षु- ये चार इन्द्रियां होती हैं उन जीवों की जाति है- चतुरिंद्रिय । मक्खी, मच्छर,भंवरा, टिड्डी,कसारी, बिच्छु आदि ।

(५) पंचेंद्रिय- जिन जीवों के स्पर्शन, रसन, घ्राण,चक्षु तथा श्रोत्र- ये पांच इंद्रियों होती हैं, उन जीवों की जाति हैं- पंचेंद्रिय । तिर्यंच्च- मच्छ,मगर,गाय, भैंस,सर्प,पक्षी आदि तथा मनुष्य,देव, नारक ।

(३) तीसरा बोल : काय छह

काय- काय शब्द का अर्थ शरीर है । ये छह प्रकार के होते हैं-

(१) पृथ्वीकाय-मिट्टी, मुरड, पत्थर,हिंगुल,हरताल,हीरा,पन्ना,कोयला,सोना,चांदी आदि सब पृथ्वीकायिक जीव हैं । मिट्टी की एक डली में असंख्य पृथक पृथक जीव होते हैं ।

पृथ्वी जीवों को जब तक विरोधी शस्त्र न लगे तब तक पृथ्वी सच्चित्त (सजीव) होती है । विरोधी शस्त्र के योग से वह एक अचित्त (निर्जीव) हो जाती है ।

(२) अप्काय- बरसात का जल, ओस का जल,समुन्द्र का जल, धूंअर का जल, कुएं, बावड़ी,तालाब,झील और नदी का जल आदि सब अप्कायिक जीव हैं । जल की एक बूंद में पृथक पृथक असंख्य जीव होते है ।

जब तक विरोधी शस्त्र न लगे तब तक जल सचित्त होता है । विरोधी शस्त्र के योग से वह अचित्त हो जाता है ।

(३) तेजस्काय- अग्नि,विद्युत, उल्का आदि सब तेजस्कायिक जीव हैं । अग्नि की एक छोटी सी चिंगारी में पृथक पृथक असंख्य जीव होते है । उनको जब तक विरोधी शस्त्र न लगे तब तक अग्नि सचित्त होती है । विरोधी शस्त्र के योग से वह अचित्त हो जाती है।

(४) वायुकाय- वायुशरीर वाले वायुक़य कहलाते है । इसके मुख्य पांच भेद हैं: उल्कलिका , मंडलिका , घनवायु , गुज्जावायु , शुद्धवायु । वायु में भी पृथक पृथक असंख्य जीव होते है । जब तक विरोधी शस्त्र न लगे तब तक वायु सचित्त होती है । विरोधी शस्त्र के योग से वह अचित्त हो जाती है ।

(५) वनस्पतिकाय- आम,अंगूर,केला , सब्जी, आलू, प्याज, लहसुन आदि वनस्पतिकाय हैं । उसके दो भेद किए गए हैं- साधारण और प्रत्येक । जैसे: वृक्ष- आम आदि ।

(६) त्रसकाय- द्वीन्द्रिय से पंचेंद्रिय तक के समस्त हिलने- चलने, घूमने- फिरने वाले जीव त्रसकायिक जीव कहलाते हैं ।

(४) चौथा बोल : इन्द्रियां पांच

इन्द्रिय- जिसके अपने एक विषय का ज्ञान होता है, उसे इन्द्रिय कहते है ।

(१) स्पर्शनइन्द्रिय- जिस इन्द्रिय से स्पर्श का ज्ञान होता है, वह स्पर्शन इन्द्रिय- त्वचा ।

(२) रसनइन्द्रिय- जिस इन्द्रिय से रस का ज्ञान होता है,वह है रसनइन्द्रिय- जिह्वा ।

(३) घ्राणइन्द्रिय- जिस इंद्रिय से गंध का ज्ञान होता है वह है घ्राणइंद्रिय- नाक ।

(४) चक्षुइंद्रिय- जिस इन्द्रिय से रूप का ज्ञान होता है वह है- चक्षुइंद्रिय- आंख ।

(५) श्रोत्रइन्द्रिय- जिस इन्द्रिय से ध्वनि का ज्ञान होता है, वह है श्रोत्रइन्द्रिय- कान ।

 

इन्द्रिय के दो भेद हैं-

(१) द्रव्येंद्रिय- नाक,कान आदि इंद्रियों की बाहरी और भीतरी पौद्गलिक रचना(आकार विशेष) को द्रव्येन्द्रिय कहते हैं ।

(२) भावेन्द्रिय- आत्मा के परिणाम विशेष (जानने की योग्यता और प्रवृत्ति) को भावेन्द्रिय कहते हैं ।

(५) पांचवां बोल : पर्याप्ति छह

 पर्याप्ति-  संसार प्राणी किसी भी जीवयोनि में उत्पन्न हो, वह जब तक जीवित रहता है तब तक उसे किसी पुष्ट आलम्बन की अपेक्षा रहती है । वह आलम्बन प्राणशक्ति तो है ही, उसके साथ एक विशिष्ट प्रकार की पौद्गालिक शक्ति भी है, जो पर्याप्ति के नाम से अपनी पहचान कराती है । पर्याप्ति का अर्थ है जीवन धारण में उपयोगी पौद्गालिक शक्ति ।

(१) आहार पर्याप्ति- इस पर्याप्ति का बंध सबसे पहले होता है । इस पर्याप्ति के द्वारा जीव जीवन भर आहार प्रायोग्य पुद्गलों के ग्रहण, परिणमन और विसर्जन करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है ।

(२) शरीर पर्याप्ति- इस के द्वारा शरीर के अंगोपंगो का निर्माण होता है ।

(३) इन्द्रिय पर्याप्ति- यह त्वचा आदि इन्द्रियों के निर्माण का कार्य सम्पन्न करती है ।

 (४) श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति- इस के द्वारा श्वास-वायु के ग्रहण और उत्सर्जन की क्षमता प्राप्त होती है ।

(५) भाषा पर्याप्ति- यह भाषा के योग्य पुद्गलों का ग्रहण और उत्सर्जन करती है । 

(६) मन: पर्याप्ति- मननयोग्य पुद्गलों के ग्रहण करने और छोड़ने में जीव का सहयोग करती है ।

(६) छठा बोल : प्राण दस

प्राण- प्राण का अर्थ है जीवनी शक्ति । प्राण संख्या में दस हैं – उनमें पांच प्राणों का संबंध इन्द्रियों की जो ज्ञान करने की शक्ति है उसे कहते हैं- पांच इन्द्रिय प्राण । मनबल, वचनबल और कायबल का संबंध मन: पर्याप्ति, भाषा पर्याप्ति एवं शरीर पर्याप्ति के साथ है ।

जीवन धारण करने में प्राणशक्ति का उपयोग होता है । प्राणी की प्राण-शक्ति का वियोजन होते ही मृत्यु हो जाती है । यह शक्ति तब प्राप्त होती है, जब जीव जन्म धारण करने के अनन्तर पर्याप्तियां बांध लेता है । इस दृष्टि से प्राण और पर्याप्ति परस्पर संबद्ध हैं ।

श्वसोच्च्छ्वास प्राण श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति से जुड़ा हुआ है । आयुष्य प्राण का संबंध आहार पर्याप्ति से है । जब तक ओज आहार रहता है, तब तक आयुष्य बल के आधार पर प्राणी जीवित रहता है । ओज आहार की समाप्ति आयुष्य की समाप्ति है । आयुष्य बल क्षीण होते ही प्राणी की मृत्यु हो जाती है ।

संसार में रहने वाले सभी प्राणी सप्राण होते हैं, किन्तु सब प्राणियों के प्राणों की संख्या समान नहीं होती । एक इन्द्रिय वाले प्राणियों में चार प्राण पाए जाते हैं । दो इन्द्रिय वाले जीवों में प्राणों की संख्या छह हो जाती है । तीन इन्द्रिय वाले जीवों में प्राण सात, चार इन्द्रिय वाले जीवों में प्राण आठ और पांच इन्द्रिय वाले जीवों में दसों प्राण पाये जाते हैं ।

(७) सातवां बोल : शरीर पांच

शरीर- जिसके द्वारा चलना, फिरना खाना – पीना आदि क्रियाएं होती हैं, प्रतिक्षण जीर्ण- शीर्ण होना जिसका स्वभाव है,जो शरीर- नामकर्म के उदय से बनता है और संसारी आत्माओं का निवास- स्थान होता है, उसे शरीर कहते हैं । शरीर पांच प्रकार के होते हैं-

(१) औदारिक शरीर- जो शरीर स्थूल पुद्गलो से निष्पन्न होता है, वह औदरिक शरीर है ।

(२) वैक्रिय शरीर – जिस शरीर से छोटापन, बड़ापन, सूक्ष्मता, स्थूलता, एकरूप, अनेक रूप आदि विविध क्रियाएं की जा सकती हैं, वह वैक्रिय शरीर हैं । जिस शरीर से हाड़,मांस, रक्त न हो तथा जो मरने के बाद कपूर की तरह उड़ जाए, उसको वैक्रिय शरीर कहते है ।

(३) आहारक शरीर- चतुर्दश पुर्वधर मुनि आवश्यक कार्य उत्पन्न होने पर जो विशिष्ट पुदगलो का शरीर बनाते हैं, वह आहरक शरीर है।

(४) तैजस शरीर- जो शरीर आहार आदि को पचाने में समर्थ है और जो तेजोमय है,वह तैजस शरीर हैं । उसे विद्युत शरीर भी कहा जाता हैं ।

(५) कार्मण शरीर- ज्ञानावरणीय आदि आठ कर्मो के पुद्गल- समूह से जो शरीर बनता हैं,वह कार्मण शरीर है ।

(८) आठवां बोल:योग पंद्रह

योग: शरीर,वचन एवं मन के द्वारा होने वाले आत्म- प्रयत्न को योग कहते हैं ।

इसके तीन प्रकार हैं-

१. मनोयोग     २. वचनयोग      ३. काययोग

मनोयोग के चार भेद –

१.सत्य मनोयोग       ३. मिश्र मनोयोग

२. असत्य मनोयोग   ४. व्यवहार मनोयोग

वचनयोग के चार भेद-

५.सत्य वचनयोग       ७. मिश्र वचनयोग

६. असत्य वचनयोग   ८. व्यवहार वचनयोग

काययोग के सात भेद–

९.औदारिक काययोग     १३. आहारक काययोग

१०. औदारिकमिश्र काययोग   १४. आहारकमिश्र काययोग

११. वैक्रिय काययोग      १५. कार्मण काययोग

१२. वैक्रियमिश्र काययोग

 

मनोयोग-मन हमारी प्रवृत्ति का सूक्ष्म किन्तु प्रमुख कारण है । मन के द्वारा होने वाला आत्मा का प्रयत्न मनोयोग है । उसके चार भेद हैं- सत्य मनोयोग, असत्य मनोयोग, मिश्र मनोयोग और व्यवहार मनोयोग ।

सत्य के विषय में होने वाली मन की प्रवृत्ति सत्य मनोयोग है ।

असत्य के विषय में होने वाली मन की प्रवृत्ति असत्य मनोयोग है ।

सत्य-असत्य के मिश्रण में होने वाली मन की प्रवृत्ति मिश्र मनोयोग है ।

मन की जो प्रवृत्ति सत्य भी नहीं है और असत्य भी नहीं है, उस प्रवृत्ति का नाम व्यवहार मनोयोग है । इसका सम्बन्ध मुख्यत: आदेशात्मक, उपदेशात्मक चिन्तन से है ।

 

वचनयोग-भाषा के द्वारा होने वाला आत्मा का प्रयत्न वचनयोग है । मनोयोग की ही भांति वचनयोग के भी चार प्रकार हैं ।

 

काययोग-शरीर के द्वारा होने वाला आत्मा का प्रयत्न काययोग है ।

काययोग का सम्बन्ध शरीर के साथ है । शरीर पांच हैं औदारिक, वैक्रिय, आहारक, तैजस और कार्मण ।

मनुष्य और तिर्यच्च गति के जीव औदारिक शरीर वाले होते हैं । औदारिक शरीर वाले जीवों की हलन-चलन रूप प्रवृत्ति औदारिक काययोग कहलाती है ।

काययोग का दूसरा भेद है– औदारिकमिश्रकाययोग- कार्मण, वैक्रिय और आहारक, इन तीनों शरीरों के साथ औदारिक का मिश्र होता है ।

देव, नारक, वैक्रियलव्धिसम्पन्न मनुष्य, तिर्यंच्च एवं वायुकाय के वैक्रियशरीर होता हैं । वैक्रिय शरीर की प्रवृति वैक्रिय काययोग हैं।

औदारिक शरीरवाले मनुष्य और तिर्यच्च वैक्रिय लव्धि का प्रयोग कर वैक्रिय रूप बनाते हैं । उस लब्धी को समेटते समय जब तक औदारिक शरीर पूरा नहीं बनता है, तब तक औदारिक काययोग के साथ वैक्रिय का मिश्र होता है ।

आहारक शरीर योगजन्य लब्धि है । यह चतुर्दश पूर्वधर मुनियों के ही हो सकता हैं । आहारक शरीर पूरा बनकर जो प्रवृत्ति करता हैं, वह आहारक काययोग कहलाता है ।

आहारक शरीर अपना काम संपन्न कर पुनः औदारिक शरीर में प्रवेश करता है । जब तक क्रिया संपन्न नहीं होती, तब तक औदारिक काययोग के साथ आहारक का मिश्र होता है । वह आहारक मिश्र काययोग कहलाता हैं ।

एक भव से दूसरे भव में जाते समय जीव जब अनाहारक रहता है, उस समय होनेवाले योग का नाम कार्मण काययोग हैं ।

(९)  नौवां बोल:उपयोग बारह

उपयोग- इस शब्द का अर्थ हैं- काम में लाना । ज्ञान एवं दर्शन को काम में लाने का नाम उपयोग है ।

ज्ञान के पांच प्रकार हैं- मति, श्रुत, अवधि, मनः पर्यव और केवल ।

ज्ञान- विशेष की उपेक्षा कर सामान्य का ज्ञान करना दर्शन है और सामान्य की उपेक्षा कर विशेष का ज्ञान करना ज्ञान है ।

(१) मतिज्ञान- इन्द्रिय और मन की सहायता से होने वाला वर्तमान कालवर्ती ज्ञान मतिज्ञान है ।

(२) श्रुतज्ञान- जो ज्ञान श्रुतानुसारी हैं- जिससे शब्द अर्थ का संबंध जाना जाता है और जो मतिज्ञान के बाद होता है, वह श्रुतज्ञान है।

(३) अवधिज्ञान- इन्द्रिय और मन की सहायता के बिना द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा से जो ज्ञान मूर्त- पदार्थों (पुद्गालो) को जानता है, उसे अवाधिज्ञान कहते है ।

(४) मन: पर्यवज्ञान- इन्द्रिय और मन की सहायता के बिना द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा से जो ज्ञान समनस्क (संज्ञी) जीवों के मन में रहे हुए भावों को जानता है, उसे मन: पर्यवज्ञान कहते है ।

(५) केवलज्ञान- मूर्त- अमूर्त, सूक्ष्म- स्थूल आदि समस्त पदार्थ और समस्त पर्याय जिससे जाने जाते हैं, वह केवलज्ञान है ।

अज्ञान- यहां अज्ञान शब्द में होने वाले ‘नञ‌् समास’ का अर्थ अभाव नहीं, पर कुत्सा है । इसका अर्थ न ज्ञान- अज्ञान अर्थात् ज्ञान का आवरण । यह ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से होता है और इससे ज्ञान का विकास रुकता है ।

अज्ञान के तीन प्रकार है- मतिअज्ञान, श्रुतअज्ञान, विभंगअज्ञान इनका अर्थ पुरवोक्त मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान के समान ही है ।

मन: पर्यवज्ञान और केवलज्ञान- ये दोनों विशिष्ट योगियों के होते हैं । वे (विशिष्ट योगी) कभी मिथ्यात्वी हो नहीं सकते । अत: अज्ञान के भेद सिर्फ तीन ही होते हैं, पांच नहीं ।

दर्शन- सामान्य बोध- अनाकार उपयोग को दर्शन कहते हैं । इनके चार भेद हैं-

(१) चक्षु:दर्शन- चक्षु:दर्शनावरणीय- कर्म का क्षयोपशम होने पर चक्षु द्वारा पदार्थों का जो सामान्य बोध होता है, उसे चक्षु:दर्शन कहते है ।

(२) अचक्षु:दर्शन- अचक्षुदर्शनावरणीय- कर्म का क्षयोपशम होने पर चक्षु के सिवाय शेष स्पर्शन, रसन, घ्राण, श्रोत्रेंद्रिय तथा मन के द्वारा पदार्थों का जो सामान्य बोध होता है, उसे अचक्षुदर्शन कहते है ।

(३) अवधि:दर्शन- अवधिदर्शनावरणीय- कर्म का क्षयोपशम होने पर इन्द्रिय और मन की सहायता के बिना रूपी द्रव्य का जो सामान्य बोध होता है, उसे अवधिदर्शन कहते है ।

(४) केवल:दर्शन- केवलदर्शनावरणीय- कर्म का क्षय होने पर आत्मा को जो सर्व पदार्थों का सामान्य बोध होता है, उसे केवलदर्शन कहते है ।

(१०) दसवां बोल: कर्म आठ

कर्म- जीव चेतनामय अरूपी पदार्थ है । उसके साथ लगे हुए सूक्ष्म मलावरण को कर्म कहते है । कर्म आठ हैं-

(१) ज्ञानावरणीय कर्म- आत्मा का पहला गुण है- केवलज्ञान (उसको रोकनेवाले पुदग्लों का नाम- ज्ञानावरणीय कर्म ।

(२) दर्शनावरणीय कर्म- आत्मा का दूसरा गुण है- केवलदर्शन । यह भी ज्ञान की भांति सब आत्माओं में विद्यमान है । इस द्वितीय गुण को आवृत्त करनेवाले कर्म- पुदग्लो का नाम है- दर्शनावरणीय कर्म ।

(३) वेदनीय कर्म- आत्मा का तीसरा गुण है- आत्मिक सुख । इसको रोकने वाले पुद्गलों का नाम है- वेदनीय कर्म ।

(४) मोहनीय कर्म- आत्मा का चौथा गुण है- सम्यक श्रद्धा । इसको रोकने वाले  पुद्गलों का नाम है- मोहनीय कर्म ।

(५) आयुष्य कर्म- आत्मा का पांचवां गुण है- अटल अवगाहन । इस शाश्वत स्थिरता को रोकने वाले पुद्गलों का नाम है- आयुष्यकर्म ।

(६) नाम कर्म- आत्मा का छठा गुण है- अमूर्तिकपन । इसको रोकने वाले पुद्गलों का नाम हैं- नाम कर्म ।

(७) गोत्र कर्म- आत्मा का सातवां गुण है- अगुरूलघुपन (न छोटपन, न बड़ापन)इसको रोकने वाले पुद्गलों का नाम है- गोत्र कर्म ।

(८) अन्तराय कर्म- आत्मा का आठवां गुण है- लब्धि । इसको रोकने वाले कर्म पुद्गलों का नाम है- अन्तराय कर्म ।

(११) ग्यारहवां बोल : गुणस्थान चौदह

गुणस्थान- आत्मिक गुणों के अलप्तम विकास से लेकर उसके सम्पूर्ण विकास तक की समस्त भूमिकाओं को जैन- दर्शन में चौदह भागों में बांट दिया गया है, जिनको गुणस्थान कहते है ।

  गुणस्थान के 14 प्रकार है-

    (१) मिथ्यादृष्टि गुणस्थान- प्रथम गुणस्थान में मोह कर्म का सबसे कम क्षयोपशम होता है । जो स्वल्पतम क्षयोपशम है, उसको मिथ्यादृष्टि कहा जाता है । अथवा मिथ्यात्वी व्यक्ति की जितनी सही दृष्टि है, वह मिथ्यादृष्टि गुणस्थान कहलाता है ।

    (२) सास्वादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान- दूसरी श्रेणी औपशमिक सम्यक्त्व से गिरकर मिथ्यात्व की ओर जानेवाले प्राणी को उपलब्ध होती है । जैसे कोई पत्ता वृक्ष से गिरता है और धरती का स्पर्श नहीं करता । वैसे ही कोई प्राणी औपशमिक सम्यक्त्व से गिरने लग गया, पूरा गिरा नहीं, छह आवलिका का समय शेष है, उस स्थिति का नाम है सास्वादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान ।

    (३) मिश्रदृष्टि गुणस्थान-  तीसरी श्रेणी मिश्रदृष्टि गुणस्थान है । यह मिथ्यात्व और सम्यक्त्व के मिश्रण यानी संदिग्ध अवस्था की प्रतीक है । इस श्रेणी में रहनेवाला व्यक्ति न इधर का रहता है न उधर का । किसी एक तत्त्व में संदेह रहने पर भी यह स्थिति प्राप्त हो जाती है । यह स्थिति अंतर्मुहूर्त से अधिक नहीं रहती । दृष्टिकोण मिथ्या बनने पर प्रथम गुणस्थान और सम्यक् बनने पर चतुर्थ गुणस्थान की उपलब्धि होती है ।

    (४) अविरतिसम्यग्दृष्टि गुणस्थान- चौथी श्रेणी का नाम है-अविरतिसम्यग्दृष्टि । इसमें सम्यक्त्व का अवतरण हो जाता है, किंतु व्रत-ग्रहण की क्षमता विकसित नहीं होती । इसमें अनंतानुबंधी चतुष्क का उपशम, क्षय या क्षयोपशम होता है, पर अप्रत्याख्यानावरण का उदय रहता है । इसलिए प्रत्याख्यान नहीं हो सकता ।

   (५) देशविरति गुणस्थान- पांचवीं श्रेणी देशविरति गुणस्थान है । इसमें अप्रत्याख्यानावरण का क्षयोपशम होता है, इसलिए अंशतः व्रत-ग्रहण की क्षमता प्राप्त हो जाती है ।

    (६) प्रमत्तसंयत गुणस्थान- छठी श्रेणी का नाम है-प्रमत्तसंयत गुणस्थान । इसमें प्रत्याख्यानावरण का क्षयोपशम हो जाने से संपूर्ण रूप से व्रती जीवन का क्रम शुरू हो जाता है । इससे आगे की सब श्रेणियों में व्रत/संयम तो रहता ही है, उसके साथ-साथ अन्य गुणों का विकास होता जाता है ।

  (७) अप्रमत्तसंयत गुणस्थान- श्रेणी का नाम है-अप्रमत्तसंयत गुणस्थान । इसमें प्रमाद छूट जाता है । हर क्षण जागरूकता में व्यतीत होता है । यह स्थिति बहुत लंबे समय तक नहीं रहती । इसलिए उर्ध्वारोहण करनेवालों को छोड़कर छठी-सातवीं श्रेणी का क्रम बदलता रहता है ।

 (८) निवृत्तिबादर गुणस्थान- आठवीं श्रेणी का नाम है-निवृत्तिबादर गुणस्थान । इसमें बादर अर्थात स्थूल कषाय की निवृत्ति हो जाती है । अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यान और प्रत्याख्यान कषाय का उपशम या क्षय हो जाने के कारण निवृत्ति को प्रधान मानकर इसे निवृत्तिबादर कहा जाता है । इस गुणस्थान में भी कुछ स्थूल कषाय बचा रहता है । पर उसकी विवक्षा नहीं की जाती । इस श्रेणी का दूसरा नाम अपूर्वकरण भी है ।

  (९) अनिवृत्तिबादर गुणस्थान- नौवें गुणस्थान में संज्वलन कषाय की अनिवृत्ति रहती है । उसी की प्रधानता से इस गुणस्थान को अनिवृत्तिबादर गुणस्थान कहा जाता है । अनिवृत्ति का यह क्रम नौवें गुणस्थान के प्रारंभ में रहता है । उसके अंतिम समय में क्रोध, मान और माया की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है । उसमें केवल लोभ अवशेष रहता है ।

   (१०) सूक्ष्मसम्पराय गुणस्थान- सूक्ष्मसंपराय का अर्थ है लोभ कषाय । जिसमें लोभ कषाय सूक्ष्म रूप में शेष रहता है, उस श्रेणी का नाम है सूक्ष्मसम्पराय गुणस्थान ।

  (११) उपशांतमोह गुणस्थान ग्यारहवीं श्रेणी है उपशांत मोह । इसमें मोह कर्म का सर्वथा उपशम हो जाता है ।

   (१२) क्षीणमोह गुणस्थान-  बारहवीं श्रेणी में मोह सर्वथा क्षीण हो जाता है ।

   (१३) सयोगीकेवली गुणस्थान-तेरहवीं श्रेणी में केवलज्ञान उपलब्ध होता है । इसका नाम है-सयोगीकेवली । इसमें केवली के मन, वाणी और शरीर की प्रवृत्ति चालू रहती है ।

    (१४) अयोगीकेवली गुणस्थान- चौदहवीं श्रेणी में पहुंचते ही प्रवृत्ति मात्र का निरोध हो जाता है । इस श्रेणी का नाम है अयोगीकेवली । इसके बाद जीव मुक्त हो जाता है । गुणवत्ता के आधार पर निर्धारित ये श्रेणियां आत्मविशुद्धि की क्रमिक भूमिकाएं हैं ।

(१२) बारहवां बोल : पांच इंद्रियों के तेईस विषय

१. श्रोत्रेंद्रिय के तीन विषय हैं-

१.जीव शब्द २. अजीव शब्द ३.मिश्र शब्द

२. चक्षुरिंद्रिय के पांच विषय हैं-

४.कृष्ण वर्ण ५. नील वर्ण ६. रक्त वर्ण ७. पीत वर्ण ८.श्वेत वर्ण

३.घाणेन्द्रिय के दो विषय हैं-

९.सुगंध १०. दुर्गंध

४. रसनेन्द्रिय के पांच विषय हैं-

११. अम्ल रस १२.मधुर रस १३. कटु रस १४.कषाय रस १५. तिक्त रस

५. स्पर्शनेंद्रिय के आठ विषय हैं-

१६. शीत- स्पर्श १७. उष्ण- स्पर्श १८. रुक्ष- स्पर्श १९. स्निग्ध- स्पर्श २०. लघु- स्पर्श २१. गुरु- स्पर्श २२. मृदु- स्पर्श २३. कर्कश- स्पर्श ।

पांच इंद्रियों के विषय, गोचर, कार्य- क्षेत्र या विहार- क्षेत्र तेईस हैं । संक्षेप में श्रोत्रेंद्रिय का शब्द, चक्षुरिंद्रिय का रूप, घ्राणेन्द्रिय का गंध, रसनेन्द्रिय का रस और स्पर्शनेन्द्रिय का स्पर्श- इस प्रकार प्रत्येक इन्द्रिय का एक- एक विषय है । विस्तार में इनके तेईस भेद हैं।

शब्द:- जीव के द्वारा जो बोला जाता है, वह है सचित शब्द, जैसे- मनुष्य का शब्द । अचित्त (जड़) पदार्थ के द्वारा जो शब्द होता है वह है- अचित्त शब्द, जैसे टूटती हुई लकड़ी का शब्द । सचित और अचित्त- दोनों के संयोग से जो शब्द होता है वह है मिश्र शब्द, जैसे- बाजे का शब्द । शब्द मात्र श्रोत्रेंद्रिय का विषय है ।

रूप:- रूप पौद्गलिक है । इसके दो अर्थ हैं- आकार और वर्ण । वर्ण पांच प्रकार का है- कृष्ण, नील, रक्त, पीत और श्वेत । रूप मात्र चक्षु:इन्द्रिय का विषय है ।

गंध:- गंध भी पौद्गलिक है । इसके दो भेद हैं- सुगंध और दुर्गंध ।

रस:- यह भी पौद्गलिक है । यह पांच प्रकार का है- तिक्त, कटु, कषाय, अम्ल और मधुर ।

स्पर्श:- स्पर्श भी पौद्गलिक है । उसके आठ भेद हैं- शीत,‌ उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, लघु, गुरू, मृदु, कर्कश ।

इनमे आदि के चार स्पर्श मूल के हैं और अंतिम चार स्पर्श उनकी बहुलता से बनते हैं ।

(१३) तेरहवां बोल : दस प्रकार के मिथ्यात्व

मिथ्यात्व:- विपरीत श्रद्धान रूप जीव के परिणाम को मिथ्यात्व कहते है ।

१.धर्म को अधर्म समझना

२.अधर्म को धर्म समझना

३.मार्ग को कुमार्ग समझना

४. कुमार्ग को मार्ग समझना

५.जीव को अजीव समझना

६.अजीव को जीव समझना

७.साधु को असाधु समझना

८. असाधु को साधु समझना

९.मुक्त को अमुक्त समझना

१०. अमुक्त को मुक्त समझना

 

धर्म- अधर्म:- जिससे आत्म- स्वरूप की उन्नति एवं अभ्युदय हो, उसे धर्म कहते हैं । इससे विपरीत समझना अधर्म कहलाता है ।

मार्ग- कुमार्ग:- ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप – ये चार मोक्ष के मार्ग हैं- साधन हैं, उपाय हैं । इन चारों को मोक्ष मार्ग न समझना और उनसे भिन्न को मोक्ष का मार्ग समझना मिथ्यात्व है ।

जीव- अजीव:- जिसमें चेतनता हो, वह जीव है और जिसमें चेतना न हो, वह अजीव है । जीव में अजीव की श्रद्धान करना और अजीव में जीव का विश्वास करना मिथ्यात्व है ।

साधु- असाधु:- साधु का लक्षण है- सम्पूर्ण रूप से पंच महाव्रत पालन करना । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । इन पांच महाव्रतो का पालन करने वाले को असाधु और न करनेवालों को साधु समझना मिथ्यात्व है ।

मुक्त- अमुक्त:- मुक्त आत्मा का लक्षण है- आठ कर्मो से मुक्ति या छुटकारा पाना । मुक्त कर्म- रहित होते हैं । जो कर्म- रहित हैं, उनको कर्म- सहित समझना और जो कर्म- सहित हैं उनको कर्म रहित समझना मिथ्यात्व है ।

(१४) चौदहवां बोल : नौ तत्व के ११५ भेद

तत्त्व:- सद्वस्तु, वह वस्तु जिसका वास्तविक अस्तित्व हो ।

तत्त्व के नौ भेद हैं-

१. जीव: चेतनामय अविभाज्य असंख्य- प्रदेशी पिंड ।

जीव के १४ भेद:

१-२. सूक्ष्म एकेंद्रिय के दो भेद- अपर्याप्त और पर्याप्त ।

३-४. बादर एकेंद्रिय के दो भेद- अपर्याप्त और पर्याप्त ।

५-६. द्वीन्द्रिय के दो भेद- अपर्याप्त और पर्याप्त ।

७-८. त्रीन्द्रिय के दो भेद- अपर्याप्त और पर्याप्त ।

९-१०. चतुरिंद्रिय के दो भेद- अपर्याप्त और पर्याप्त ।

११-१२. असंज्ञी पंचेंद्रिय के दो भेद- अपर्याप्त और पर्याप्त ।

१३-१४. संज्ञी पंचेंद्रिय के दो भेद- अपर्याप्त और पर्याप्त ।

२. अजीव: अचेतन तत्त्व ।

अजीव के १४ भेद:

१. धर्मास्तिकाय के तीन भेद हैं- स्कंध, देश, प्रदेश ।

२.अधर्मास्तिकाय के तीन भेद हैं- स्कंध, देश, प्रदेश ।

३. आकाशास्तिकाय के तीन भेद हैं- स्कंध, देश, प्रदेश ।

४.काल का एक भेद हैं- काल ।

५.पुद्गलास्तिकाय के चार भेद हैं- स्कंध, देश, प्रदेश, परमाणु ।

 

३. पुण्य:- सुख देनेवाला उदीयमान शुभ कर्म पुद्गल – समूह ।

पुण्य के नौ भेद हैं-

१.अन्न पुण्य २.पान पुण्य ३.स्थान पुण्य ४.शय्या पुण्य ५.वस्त्र पुण्य ६. मन पुण्य ७.वचन पुण्य ८. काय पुण्य ९. नमस्कार पुण्य ।

 

४. पाप:- दुख देनेवाला उदीयमान अशुभ कर्म पुद्गल- समूह ।

पाप के अठारह भेद हैं-

१. प्राणातिपात पाप २.मृषावाद पाप ३. अदतादान पाप ४.मैथुन पाप ५. परिग्रह पाप ६.क्रोध पाप ७.मान पाप ८.माया पाप ९.लोभ पाप १०.राग पाप ११.द्वेष पाप १२. कलह पाप १३.अभ्याख्यान पाप १४. पैशुन्य पाप १५. पर- परिवाद पाप १६. रति- अरति पाप १७.मायामृषा पाप १८. मिथ्यादर्शनशल्य पाप

५. आश्रव:- कर्म ग्रहण करने वाली आत्मा की अवस्था ।

इसके मुख्य पांच भेद है-

१. मिथ्यात्व आश्रव २.अव्रत आश्रव ३.प्रमाद आश्रव ४. कषाय आश्रव ५.योग आश्रव

और गौण पंद्रह भेद हैं-

१. प्राणातिपात आश्रव २.मृषावाद ३. अदत्तादान ४. मैथुन ५. परिग्रह ६. श्रोत्रेंद्रिय ७. चक्षु: इन्द्रिय ८. घाणेंद्रिय ९. रसनेन्द्रिय १०. स्पर्शनेंद्रिय ११. मन १२.वचन १३.काया १४. भंडोपकरण १५. सूचि- कुशाग्र मात्र ।

६. संवर:- कर्म निरोध करनेवाली आत्मा की अवस्था । प्राणातिपात आदि पंद्रह आश्रवो के अप्राणातिपात आदि पंद्रह संवर प्रतिपक्षी हैं । मुख्य पांच भेद हैं-

१. सम्यक्तव संवर २. व्रत संवर ३. अप्रमाद संवर ४. अकषाय संवर ५. अयोग संवर

और इसके गौण पंद्रह भेद है-

१. प्राणातिपात विरमण संवर २. मृषावाद विरमण संवर ३. अदत्तादान विरमण संवर ४. अब्रह्मचर्य विरमण संवर ५. परिग्रह विरमण संवर ६. श्रोत्रेंद्रिय निग्रह संवर ७.चक्षु:इन्द्रिय निग्रह संवर ८. घ्राणेन्द्रिय निग्रह संवर ९. रसनेन्द्रिय निग्रह संवर १०. स्पर्शनेंद्रिय निग्रह संवर ११. मनो निग्रह संवर १२.वचन निग्रह संवर १३. काय निग्रह संवर १४. भंडोपकरण रखने में अयतना न करना १५. सूचि- कुशाग्र मात्र दोष सेवन न करना ।

 

७. निर्जरा:- शुभ योग की प्रवृत्ति से होने वाली आत्मा की आंशिक उज्जवलता को निर्जरा कहते हैं । निर्जरा के बारह भेद हैं-

१. अनशन २. उनोदरी ३.भिक्षाचारी ४. रस- परित्याग ५. कायक्लेश ६. प्रतिसंलीनता ७. प्रायश्चित ८. विनय ९. वैयावृत्य १०. स्वाध्याय ११. ध्यान १२. व्युत्सर्ग ।

 

८. बंध:- आत्म- प्रदेशों के साथ कर्म- पुद्गलो का दूध- पानी की तरह मिल जाना, संबंधित हो जाना, एकीभाव हो जाना, बंध कहलाता है । बंध चार प्रकार का होता हैं-

१. प्रकृति बंध २. स्थिति बंध ३. अनुभाग बंध ४. प्रदेश बंध ।

९. मोक्ष:- अपूर्ण रूप से कर्मो का क्षय होना निर्जरा और पूर्ण रूप से कर्मो का क्षय होना मोक्ष है । मोक्ष प्राप्त करने के चार उपाय या साधन हैं-

१.ज्ञान २. दर्शन ३. चारित्र ४. तपस्या ।

(१५) पंद्रहवां बोल : आत्मा आठ

आत्मा- जीव की जितनी परिणतिया हैं, भिन्न भिन्न प्रकार की रूपांतरित अवस्थाएं हैं, उतनी ही आत्माएं हैं । इसलिए वे सब अप्रतिपाद्य हैं- उनका वर्णन नहीं किया जा सकता । प्रस्तुत बोल में प्रधानत: आठ आत्माओं का ही प्रतिपादन किया गया है-

(१) द्रव्य आत्मा- चैतन्यमय असंख्य प्रदेशों का पिंड जीव ।

(२) कषाय आत्मा- जीव की क्रोध, मान, माया, लोभ- इन चार की कषाय परिणति ।

(३) योग आत्मा- जीव की मन,वचन और काया- इन तीनों की योगमय परिणति ।

(४) उपयोग आत्मा- जीव की ज्ञान- दर्शनमय परिणति ।

(५) ज्ञान आत्मा- जीव की ज्ञानमय परिणति ।

(६) दर्शन आत्मा- जीव आदि तत्वों के प्रति यथार्थ या अयाथार्थ श्रधान ।

(७) चारित्र आत्मा- कर्मो का निरोध करने वाला जीव का परिणाम ।

(८) वीर्य आत्मा- जीव का सामर्थ्य विशेष ।

(१६) सोलहवां बोल: दंडक चौबीस

दंडक:- जहां प्राणी अपने कृत- कर्मो का फल, जो एक प्रकार का दण्ड है, भोगते हैं, उन स्थानों, अवस्थाओं को दंडक कहते हैं ।

सात नारक का- दंडक एक पहला

१.भवनपति देवों के दंडक दस

२.असुरकुमार का दंडक दूसरा

३.नागकुमार का दंडक तीसरा

४. सुपर्णकुमार का दंडक चौथा

५. विद्युत्कुमार का दंडक पांचवां

६.अग्निकुमार का दंडक छठा

७. द्वीपकुमार का दंडक सातवां

८. उदधिकुमार का दंडक आठवां

९.दिककुमार का दंडक नौवां

१०.वायुकुमार का दंडक दसवां

११. स्तनितकुमार का दंडक ग्यारहवां

१२. पृथ्वीकाय का दंडक बारहवां

१३. अप्काय का दंडक तेरहवां

१४. तेजसकाय का दंडक चौदहवां

१५.वायुकाय का दंडक पंद्रहवां

१६. वनस्पतिकाय का दंडक सोलहवां

१७. द्वीन्द्रिय का दंडक सतरहवां

१८. त्रीन्द्रिय का दंडक अठारहवां

१९. चतुरिंद्रिय का दंडक उन्नीसवां

२०. तिर्यच्च पंचेंद्रिय का दंडक बीसवां

२१. मनुष्य पंचेंद्रिय का दंडक इक्कीसवां

२२.व्यंतर देवों का दंडक बाईसवां

२३.ज्योतिष्क देवों का दंडक तेइसवां

२४.वैमानिक देवों का दंडक चौबीसवां

(१७) सतरहवां बोल : लेश्या छह

लेश्या:- जीव के शुभाशुभ परिणाम को लेश्या कहते है ।

इनके छह प्रकार हैं-

१. कृष्णलेश्या: – काजल के समान कृष्ण और नीम से अनन्तगुण कटु पुद्गलो के संबंध से आत्मा में जो परिणाम होता है, वह कृष्ण लेश्या है ।

२. नीललेश्या:- नीलम के समान नीले और सौंठ से अनन्तगुण तीक्ष्ण पुद्गलो के सम्बन्ध से आत्मा में जो परिणाम होता है, वह नीललेश्या है ।

३. कापोतलेश्या:- कबूतर के गले के समान वर्ण वाले और कच्चे आम के रस से अनन्तगुण कषैले पुद्गलो के संबंध से आत्मा में जो परिणाम होता है, वह कापोतलेश्या है ।

४. तेजोलेश्या:- हिंगुल (सिंदूर) के समान रक्त और पके आम के रस से अनन्तगुण मधुर पुद्गलो के संयोग से आत्मा में जो परिणाम होता है, वह तेजोलेश्या है ।

५. पद्मलेश्या:- हल्दी के समान पीले तथा मधु से अनन्तगुण मिष्ट पुद्गलो के संयोग से आत्मा का जो परिणाम होता है, वह पद्मलेश्या है ।

६. शुक्ललेश्या:- शंख के समान श्वेत और मिश्री से अनन्तगुण मीठे पुद्गलो के संबंध से आत्मा का जो परिणाम होता है, वह शुक्ललेश्या है ।

(१८) अठारहवां बोल : दृष्टि तीन

दृष्टि:- साधारणतया दृष्टि का अर्थ है- चक्षु । परन्तु यहां पर दृष्टि का प्रयोग तत्त्व- श्रद्धा (तात्विक रुचि) के अर्थ में हुआ है ।

दृष्टि के तीन प्रकार है-

१. सम्यकदृष्टि- सम्यक अर्थात् पदार्थों के असली स्वरूप को जानने वाले की दृष्टि सम्यकदृष्टि होती है ।

२. मिथ्यादृष्टि- मिथ्या अर्थात् पदार्थों को मिथ्या माननेवाले की दृष्टि मिथ्यादृष्टि होती है ।

३. सम्यक- मिथ्यादृष्टि- शेष तत्त्वों में यथार्थ विश्वास रखने वाले तथा किसी एक तत्त्व में संदेह रखनेवाले की दृष्टि सम्यक- मिथ्यादृष्टि होती है ।

(१९) उन्नीसवां बोल: ध्यान चार

ध्यान:- चिंतनीय विषय में मन को एकाग्र करना, एक विषय पर मन को स्थिर करना अथवा मन,वचन और काया की प्रवृत्ति का निरोध करना ।

ध्यान चार है-

१. आर्त्तध्यान- अर्ति का अर्थ है- पीड़ा या दुख । उसमे होने वाली एकाग्रता को आर्त्तध्यान कहते है ।

२. रौद्रध्यान- जिसका चित्त क्रूर और कठोर हो, वह रुद्र होता है और उसके ध्यान को रौद्र कहा जाता है ।

३. धर्मध्यान- वीतराग या सर्वज्ञ की आज्ञा (उपदेश) पर चिंतन करना । उस विषय में निरंतर सोचते रहना धर्मध्यान है ।

४. शुक्लध्यान- शुक्ल ध्यान का अर्थ है परिपूर्ण समाधि । यह चिंतन की निर्मलता का प्रकृष्ट रूप है । शुक्ल ध्यान की चार अवस्थाएं हैं । चौथी अवस्था में पहुंचने के बाद जीव सांसारिक बंधनों से सर्वथा मुक्त हो जाता है ।

(२०) बीसवां बोल:द्रव्य छह

द्रव्य:- जिसमें गुण और पर्याय होते है, उसको द्रव्य कहते है ।

(१) धर्मास्तिकाय- यहां धर्म का अर्थ हैं- जो जीव और पुद्गल की गति में उदासीन सहायक होता है, वह द्रव्य । अस्तिकाय का अर्थ है प्रदेश- समूह ।

(२) अधर्मास्तिकाय- जो स्थिति में उदासीन सहायक है, वह द्रव्य । अस्तिकाय का अर्थ है प्रदेश- समूह ।

(३) आकशास्तिकाय- आकाश का अर्थ है- जिसमें जीव और पुद्गल को आश्रय प्राप्त है, वह द्रव्य । अस्तिकाय का अर्थ है प्रदेश- समूह ।

(४) काल- मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास आदि काल- व्यवहार सिर्फ मनुष्य- लोक में ही होता है, बाहर नहीं ।

(५) पुद्गलास्तिकाय- जो वर्ण,गंध,रस,स्पर्श युक्त हो और जिसमें मिलने और पृथक होने का स्वभाव विद्यमान हो, उसे पुद्गल कहा जाता है । अस्तिकाय का अर्थ है प्रदेश- समूह ।

(६) जीवस्तिकाय- जीव का अर्थ है- प्राण धारण करनेवाला । अस्तिकाय का अर्थ है प्रदेश- समूह ।

(२१) इक्कीसवां बोल:राशि दो

           जब हम संसार- भर की वस्तुओं को पृथक – पृथक् करने लगते हैं, तब उनको कई हज़ार श्रेणियों में पहुंचा देते हैं, जैसे- मनुष्य, गाय, भैंस, ऊंट,मकान, कोट, बर्तन आदि और जब वापस मुड़ते हैं- एकीकरण की ओर दृष्टि डालते हैं, तब हमें मूल रूप में दो ही पदार्थ- राशियां मिलती हैं-

(१) जीव राशि= चेतन-ज्ञानवान आत्माओं की राशि ।

(२) अजीव राशि= अचेतन- ज्ञान- रहित जड़ पदार्थों की राशि ।

हम यह निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि जगत में उन दो राशियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है अथवा यों कहा जा सकता है कि जगत का अस्तित्व इन दोनों के अस्तित्व पर ही निर्भर है ।

(२२) बाइसवां बोल: श्रावक के बारह व्रत

आचरण की पवित्रता ही मानव जीवन का सर्वस्व है । कोरे ज्ञान या कोरे आचरण में मोक्ष नहीं मिलता, किन्तु दोनों के उचित संयोग से ही मोक्ष मिलता है ।

कहीं – कहीं  गृहस्थ साधु- व्रत स्वीकार किए बिना भी संयम का प्रचुर अभ्यास करने के कारण साधुवत बन जाते है । वे प्रतिमाधारी श्रावक कहलाते हैं ।

(१) अहिंसा- अणुव्रत- श्रावक छोटे- बड़े सभी जीवों की मानसिक,वाचिक तथा कायिक हिंसा का पूर्णतया त्याग नहीं करता,परन्तु वह कुछ अंशों में स्थूल हिंसा का त्याग कर सकता है ।

(२) सत्य- अणुव्रत- किसी निर्दोष प्राणी की हत्या हो वैसे असत्य का त्याग करना सत्य- अणुव्रत है ।

(३) अस्तेय- अणुव्रत- डाका डालकर, ताला तोड़कर, लूट- खसोटकर, बड़ी चोरी का त्याग करना अस्तेय- अणुव्रत है ।

(४) ब्रह्मचर्य- अणुव्रत- कामुकता की सीमा करना ब्रह्मचर्य- अणुव्रत है ।

(५) अपरिग्रह- अणुव्रत- सोना, चांदी, मकान, धन आदि सब परिग्रह हैं । परिग्रह के संचय की मर्यादा करना अपरिग्रह- अणुव्रत है।

(६) दिग्विरति – व्रत- पूर्व, पश्चिम आदि सभी दिशाओं का परिणाम निश्चित कर उसके बाहर हर तरह के सावध- कार्य करने का त्याग करना दिग्विरति अणुव्रत है ।

(७) भोगोपभोग- परिणाम- व्रत- पंद्रह प्रकार के कर्मादान और छब्बीस प्रकार के भोगोपभोग की प्रवृत्ति की मर्यादा करना भोगोपभोग- परिणाम- व्रत है ।

(८) अनर्थदण्डविरति व्रत- बिना प्रयोजन हिंसा में प्रवृत्ति करने का त्याग करना अनर्थदण्डविरति- व्रत है ।

(९) सामयिक व्रत- एक मुहूर्त तक सावध- प्रवृत्ति का त्याग कर स्वभाव में स्थिर होने का अभ्यास करना सामायिक- व्रत है ।

(१०) देशावकाशिक- व्रत- एक निश्चित अवधि के लिए हिंसा आदि का त्याग करना देशावकाशिक व्रत है ।

(११) पौषध-व्रत- अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावस्या तथा अन्य किसी तिथि में उपवास के साथ शारीरिक साजसज्जा को छोड़कर एक दिन रात तक सावध प्रवृत्ति का त्याग करना पौषध व्रत है । यह चौविहार उपवास के साथ ही हो सकता है ।

(१२) अतिथि- संविभाग- व्रत- साधु को अशुद्ध दान देने का त्याग करना और निर्दोष दान देना अतिथि- संविभाग- व्रत है ।

 

(२३)  तेइसवां बोल:पांच महाव्रत

महाव्रत:- जब कोई दीक्षित होता है, उस समय वह आजीवन पांच महाव्रतो का पालन करने की प्रतिज्ञा करता है । वह तीन करण और तीन योग से पांच आश्रवो (हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन और परिग्रह) का प्रत्याखान करता है ।

(१) अहिंसा- महाव्रत- पहला महाव्रत अहिंसा का है । उसमे जीव- हिंसा का सर्वथा त्याग किया जाता है ।

(२) सत्य- महाव्रत- दूसरे महाव्रत में असत्य बोलने का सर्वथा परित्याग किया जाता है ।

(३) अचौर्य- महाव्रत- तीसरे महाव्रत में चोरी करने का सर्वथा त्याग किया जाता है । अधिकारी के बिना साधु किसी भी मकान में ठहर नहीं सकता और वह अभिभावकों की अथवा आश्रित व्यक्तियों की अनुमति के बिना किसी को दीक्षा भी नहीं दे सकता ।

(४) ब्रह्मचर्य- महाव्रत- चौथे महाव्रत में मैथुन- अब्रह्मचर्य का सर्वथा परित्याग किया जाता है । साधु स्त्री- जाति का स्पर्श तक नहीं कर सकता, चाहे उसकी वह मां या बहिन ही क्यों न हो । साधु स्त्री के साथ एक आसन पर नहीं बैठ सकता ।

(५) अपरिग्रह- महाव्रत- पांचवे महाव्रत में परिग्रह का सर्वथा परित्याग किया जाता है । साधु आवश्यक धर्मोपकरण के सिवाय और किसी भी वस्तु का संचय नहीं करता । धर्मोपकरण पर भी वह ममता या मूर्च्छा नहीं करता ।

(६) रात्रि-भोजन-विरति- इन पांच महाव्रतो के सिवाय एक छठा व्रत ओर है । उसमे जीवन- पर्यन्त रात्रि भोजन का त्याग किया जाता है । रात्रि में कोई भी खाने पीने की चीजें पास रखना साधु के लिए निषिद्ध है । साधु रात्रि में कुछ भी खा- पी नहीं सकता ।

(24) चौबीसवां बोल: भांगा ४९

तीन करण तीन योग से ।

तीन करण- करना, कराना, अनुमोदन करना ।

तीन योग- मन, वचन, काया ।

 

अंक ११ का भांगा ९

यहां पहले अंक १ का अर्थ हैं- एक करण और दूसरे अंक १ का अर्थ है- एक योग । अर्थात् एक करण और एक योग से ९ भांगे हो सकते है ।

(क) १. करू नहीं मन से ।

          २. करू नहीं वचन से ।

          ३. करू नहीं काया से ।

(ख) ४. कराऊ नहीं मन से ।

          ५. कराऊ नहीं वचन से ।

          ६. कराऊ नहीं काया से ।

(ग)  ७. अनूमोदू नहीं मन से ।

          ८. अनुमोदू नहीं वचन से ।

          ९. अनुमोदू नहीं काया से ।

 

अंक १२ का भांगा ९

यहां पहले अंक १ का अर्थ है- एक करण एवं दूसरे अंक २ का अर्थ है- दो योग । अर्थात् एक करण और दो योग से ९ भांगे हो सकते हैं जैसे-

(क) १. करू नहीं- मन से, वचन से ।

         २. करू नहीं- मन से, काया से ।

         ३. करू नहीं- वचन से, काया से ।

(ख) ४. कराऊ नहीं- मन से, वचन से ।

          ५. कराऊ नहीं- मन से, काया से ।

          ६. कराऊ नहीं- वचन से, काया से ।

(ग)  ७. अनुमोदू नहीं- मन से, वचन से ।

          ८. अनुमोदू नहीं- मन से, काया से । 

          ९. अनुमोदू नहीं- वचन से, काया से ।

 

अंक १३ का भांगा ३

यहां पहले अंक १ का अर्थ है- एक करण एवं दूसरे अंक ३ का अर्थ है- तीन योग । अर्थात् एक करण और तीन योग से ३ भांगे हो सकते है ।

(क) करू नहीं- मन से, वचन से, काया से । 

(ख) कराऊ नहीं- मन से, वचन से, काया से ।

(ग) अनुमोदू नहीं- मन से, वचन से, काया से ।

 

अंक २१ का भांगा ९

यहां पहले अंक २ का अर्थ है दो करण एवं दूसरे अंक १ का अर्थ है- एक योग । अर्थात् दो करण एवं एक योग से ९ भांगे हो सकते हैं, जैसे-

 

(क)  १. करू नहीं, कराऊ नहीं- मन से ।

       २. करू नहीं, कराऊ नहीं- वचन से ।

       ३. करू नहीं, कराऊ नहीं- काया से ।

(ख) ४. करू नहीं, अनुमोदू नहीं- मन से ।

      ५. करू नहीं, अनुमोदू नहीं- वचन से ।

      ६. करू नहीं,अनुमोदू नहीं- काया से ।

(ग)  ७. कराऊ नहीं, अनुमोदू नहीं- मन से ।

       ८. कराऊ नहीं, अनुमोदू नहीं- वचन से ।

       ९. कराऊ नहीं, अनुमोदू नहीं- काया से ।

 

अंक २२ का भांगा ९

यहां पहले अंक २ का अर्थ है- दो करण और दूसरे अंक २ का अर्थ है- दो योग । अर्थात् दो करण एवं दो योग से ९ भांगे हो सकते हैं, जैसे-

 

(क) १. करू नहीं, कराऊ नहीं- मन से, वचन से ।

       २. करू नहीं, कराऊ नहीं- मन से, काया से ।

       ३. करू नहीं, कराऊ नहीं- वचन से, काया से ।

(ख) ४. करू नहीं, अनुमोदू नहीं- मन से , वचन से ।

       ५. करू नहीं, अनुमोदू नहीं- मन से, काया से ।

       ६. करू नहीं, अनुमोदू नहीं- वचन से , काया से ।

(ग)  ७. कराऊ नहीं, अनुमोदू नहीं- मन से, वचन से ।

       ८. कराऊ नहीं,अनुमोदू नहीं- मन से, काया से ।

       ९. कराऊ नहीं, अनुमोदू नहीं- वचन से, काया से ।

 

 

अंक २३ का भांगा ३

यहां पहले अंक २ का अर्थ हैं- दो करण एवं दूसरे अंक ३ का अर्थ है तीन योग । अर्थात् दो करण एवं तीन योग से ३ ही भांगे हो सकते हैं, जैसे-

 

(क) करू नहीं, कराऊ नहीं- मन से , वचन से, काया से ।

(ख) करू नहीं, अनुमोदू नहीं- मन से, वचन से, काया से ।

(ग) कराऊ नहीं, अनुमोदू नहीं- मन से, वचन से, काया से ।

 

अंक ३१ का भांगा ३

यहां पहले अंक ३ का अर्थ तीन करण एवं दूसरे अंक १ का अर्थ है- एक योग अर्थात् तीन करण एवं एक योग से ३ भांगे हो सकते हैं, जैसे-

 

(क)  करू नहीं, कराऊ नहीं, अनूमोदू नहीं- मन से ।

(ख)  करू नहीं, कराऊ नहीं, अनूमोदू नहीं- वचन से ।

(ग)  करू नहीं, कराऊ नहीं, अनूमोदू नहीं- काया से ।

 

अंक ३२ का भांगा ३

यहां पहले अंक ३ का अर्थ है- तीन करण एवं दूसरे अंक २ का अर्थ है- दो योग अर्थात् तीन करण एवं दो योग से ३ भांगे हो सकते हैं, जैसे-

 

(क)  करू नहीं, कराऊ नहीं, अनूमोदू नहीं- मन से, वचन से ।

(ख)  करू नहीं, कराऊ नहीं, अनूमोदू नहीं- मन से, काया से ।

(ग)  करू नहीं, कराऊ नहीं, अनुमोदू नहीं- वचन से, काया से ।

 

अंक ३३ का भांगा १

यहां पहले अंक ३ का अर्थ है- तीन करण एवं दूसरे अंक ३ का अर्थ है- तीन योग अर्थात् तीन करण एवं तीन योग से १ ही भांगा हो सकता है, जैसे-

१.  करू नहीं, कराऊ नहीं, अनुमोदू नहीं- मन से, वचन से, काया से ।

(२५) पच्चीसवां बोल: चारित्र पांच

चारित्र:- इस शब्द के तीन अर्थ हैं- १.आत्मा की अशुद्ध प्रवृत्ति का निरोध ।

२.आत्मा को शुद्ध- दशा में स्थित रखने का प्रयत्न ।

३. जिससे कर्म का क्षय होता है, वैसी प्रवृत्ति ।

चारित्र पांच प्रकार के है-

(१) सामयिक चारित्र:- समभाव में स्थिर रहने के लिए सम्पूर्ण अशुद्ध प्रवृत्तियों का त्याग करना सामायिक चारित्र है ।

(२) छेदोपस्थाप्य चारित्र:- दीक्षा ग्रहण करते समय सामायिक चारित्र लिया जाता है । इसमें केवल ‘सव्वं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि’- सर्व सावध योग का त्याग किया जाता है । किन्तु दीक्षित होने के सात दिन या छह मास बाद साधक में पांच महाव्रतों  की विभगाशः आरोपणा की जाती है । इसे छेदोपस्थाप्य चारित्र कहा जाता है ।

(३) परिहार विशुद्धि चारित्र:- परिहार का अर्थ है- विशुद्धि का विशिष्ट साधना । इस विशुद्धिमय चारित्र का नाम परिहार विशुद्धि है।

(४) सूक्ष्म- संपराय चारित्र:- जिस अवस्था में क्रोध, मान और माया का उपशम व क्षय हो जाता है, केवल सूक्ष्म लोभ का अंश विद्यमान रहता है, उस समुज्जवल अवस्था में सूक्ष्म- संपराय नामक चारित्र प्राप्त होता है ।

(५) यथाख्यात चारित्र:- जिस अवस्था में मोह सर्वथा उपशांत या क्षीण होता है, उसे यथाख्यात चारित्र कहते हैं । इसे वीतराग चारित्र भी कहा जा सकता है ।