संतोष ही वास्तविक खुशी (Authentic Happiness )

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संतोष ही वास्तविक खुशी है

रिश्ते-नाते, आभुषणों में खुशी को हमने कभी पाया होगा,

घुमने फिरने, मोज मस्ती में खुशी को हमने थोड़ा ढ़ुंढा होगा।

सब है फिर भी सुकुन नहीं, इस वास्तविक खुशी का राज क्या होगा?

कैसे रहे हम हर पल-हर क्षण खुश, आज हमें मिलकर सोचना होगा।।

 

खुशी.. खुशी का नाम सुनते ही बुझे हुए चेहरों पर रौनक और चमक आ जाती है। क्या कोई है इस दुनिया में जो खुश नहीं रहना चाहता? । सब कोई खुश रहना चाहते है। लेकिन ये खुशी क्या है?

 

खुशी एक feeling यानी मन की एक अवस्था है, तंरग है। मन में उत्साह, उल्लास, उमंग, प्रसन्नता इत्यादि । यह सब खुशी की ही तरंगें है । खुशी हमें दिखाई नहीं देती है यह हमारे भीतर ही महसुस की जाती है। और जब हम खुशी महसुस करते है तो यह हमारे चेहरे पे छलकती है। और यह खुशी हमें दो कारणों से मिल सकती है।

 

External Factors & Internal Factors ये खुशी प्राप्त करने के दो कारण हो सकते है। ये इन दोनों में क्या डिफेर्न्स है और वास्त्विक खुशी क्या है और किसमें है? यह जानना बहुत जरुरी है।

 

Internal Factors हम सब के अंदर ही खुशी की जादूई शक्ति मौजूद है। जैसे हम बात कर रहे थे। Internal Factors like चाह को खत्म करना यानी समता और संतोष में ही खुशी, प्रसन्नता और आनंद है और यह सब भीतर ही छुपा हुआ है यही वास्तविक खुशी है, जरूरत है केवल उसे अपने अंदर ढूंढ निकालने की और समझने की। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम कौन हैं और किस अवस्था में हैं, यदि हम चाहें तो सकारात्मक सोच , समता और संतोष रखकर खुशी को अपने अंदर ही महसूस कर सकते हैं। और यही वास्तविक खुशी है। यही permanent & authentic happiness है।

 

External Factors अब जानते है कि क्या External Factors  से भी हमें वास्तविक खुशी मिलती है। External Factors like पैसा, रिश्तों नाते, मान-सम्मान, कार, बंगला, खाना- पीना, घुमना-फिरना, पार्टी-शार्टी, नाचना, गाना इन सब बाहरी पदार्थों और पुद्गलों से जो खुशी मिलती है वो temporary खुशी है। इस खुशी की उत्पत्ति दु:ख से या कामाना या चाह से उत्पन्न होती है । जब तक हमें नहीं मिलता तब तक हम दु:खी रहते है और जब मिल जाता है तो हम खुश होते है। और फिर जब उसकी उपयोगिता खत्म हो जाती है तो फिर उसी से ही दु:ख की अनुभुति होने लगती है।

 

Spiritual Way:- तात्विक दृष्टि से जहां पौदगलिक सुखों की बात है वह दु:खों से उत्पन्न होता है। जैसे प्यास लगी आपने पानी पिया आपको परम सुख की अनुभुति हुई। अब आपको दुसरा गलास दिया पीने और आपने पिया तो आपको पहले से थोड़ा कम सुख मिला। लेकिन अब तीसरा गलास आपको जबर्दस्ती कोई पिला दे तो उस समय आपको दु:ख की अनुभुति होने लग जायेगी। क्योंकि अब पानी की उपयोगिता, इच्छा खत्म हो गई। यहां पानी सुख का कारण नहीं था। क्योंकि अगर पानी सुख होता तो आपको हर समय पानी से सुख ही मिलता। पानी से सुख मिला वह दु:ख से उत्पन्न हुआ वह दु:ख था आपकी प्यास, इच्छा। अब यह पानी के रूप में कुछ भी ले लो जैसे पैसा, कार, बंगला, गाड़ी, बेट-बेटी, पतिपत्नि, मान सम्मान कुछ भी हो सकता है। जब सब इच्छा के अनुसार होता है तो खुशी मिलती जैसे ही इच्छा के विपरीत हुआ वैसे ही दु:ख शुरू। ऐसा लग रहा है हम सब इच्छा, कामना, वासना के गुलाम होके रखे है और जैसे वो नचाते है वैसे हम खुशी मान कर झूम रहे है। यह पहले क्षण तो सुख देता है दूसरे क्षण दु:ख देने लग जाता है। तो बताओ कहां है इसमें वास्तविक खुशी? वास्तविक खुशी पुद्गलों से कभी नहीं मिल सकता है यह तो हमारे मन का भ्रम है। जो संतोष है वही सुख है वही परम आनंद है। आगमों में एक दोहा आता है –

 

सिरीए मतिम तुस्से अइ सिरिं तु पत्थए ।

अइ-सिरिमिछंतीए थेरीए विणासिओ अप्पा ॥

 

अर्थात्‌ थोड़ी लक्ष्मी से संतोष कर लो, किन्तु अधिक लक्ष्मी की चाह मत करो । अधिक समृद्धि को चाहती हुई बुढ़िया (पड़ोसिन) ने अपने को नष्ट कर लिया ।

 

असंयम और राग-द्वेष ही दु:ख का कारण है। राग ही सबसे बड़ा दु:ख का कारण है। 5 इंद्रियों का संयम ही वास्तविक सुख है।  हम जितना जागरुक रह सकते है। जितना हम संसार विरक्त, संयम की साधना करेंगें उतना ही वास्तविक सुख की ओर कदम बढ़ा सकते है। और इन सबके लिए हमें सिर्फ अपने भावों को पवित्र रखना होगा। यह सारा खेल ही भावों का है। जैसे कहते है न:-  “जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि,  इसीलिए सोच बदलो, दिशा बदलेगी।“

 

वास्त्विक खुशी हमारे भीतर ही है पता नहीं क्यों सब इसको बाहर में ढुंढ ने में लगे हुए है। यह कहावत याद आ रही है बगल में छोरा, गांव में ढ़िंढोरा। यह स्थिति आज सभी की हो रखी है। कपड़ो, गहनों में खुशी मिलती है और फिर दुसरों की उससे अच्छी साड़ी, गहने देख लिए तो खुशी वहीं खत्म, जलन शुरू। गोवा जाने में खुशी मिली। लेकिन जब सुना हमारे दोस्त स्विट्जरलेड घुमने गए तो खुशी गयाब और पति को दिन रात सुनना शुरू। पार्टी शार्टी किए खुश हुए और फेसबुक, वाट्सप, इन्सटा पे फोटो डाले और जब लाइक कोमेंट नहीं मिले तो पुरे दिनभर टेंशन टेंशन। ऐसा लगता है कि हमारे खुशी का रिमोट कंट्रोल हमारे पास नहीं है। दुसरे के पास है जैसे वो नचाते है वैसे हम नाचते है। अगर हमारा रिमोट कंट्रोल हमारे पास होगा तो हम कभी भी दु:खी नहीं होंगे। वास्त्विक खुशी चाहिए तो हमें अपना रिमोट कंट्रोल अपने पास ही रखना होगा।

 

जलन, इर्ष्या, हीनभावना, देखादेखी, प्रतिस्पर्धा, एक दुसरे का बुरा सोचना, उम्मीद, चाह रखना इत्यादि इन सभी चीजों से बचेंगे तो हम दु:खी नहीं होंगे। हर जगह खुश रहना, औरों को भी खुश करना है अपने रिश्ते-नाते और अपने जीवन को खुशहाल बनाना है तो आज से ही आप सब अपनी जिंदगी में खुश रहना का फोर्मुला अपना लिजिए। आप भी खुश रहेंगे और दुसरे को भी खुशी बांट कर अपनी खुशहाल जिंदगी की personality में चार चांद लगा सकेंगे। तो आइए जानते Happiness का फोर्मुला है:- Happiness का पहला letter है H……

H:- Health का ध्यान रखें। /Humble बने।

A:- Appreciation करें। Thank u & Gratitude की भावना रखें। attachment न रखें।

P:- Peace/politeness रखें।

P:- Present में जीये। past and future की चिंता को करें tata bye bye

I:- Independent thinking रखे। किसी के बहकावे में ना आये।

N:- Neutral रहे हर परिस्थिति में।

E:- Expectation न रखे।

S:- share करना सीखे।

S:- Spirituality को अपनाएं। Materialistic life से जितना दुर रह सकते है उतना रहें। उसकी इच्छा न रखें। comfort या कुछ भी मिला तो ठीक नहीं मिला तो ठीक ऐसी भावना रखें।

 

इसके साथ ही Thank U, please, sorry को हमेशा अपनी जुबान पे रखें। तुलनात्मक चिंतन न करें, दुसरों को समझें, तारीफ करें। किसी के प्रति गलत भावना न रखें। अकसर देखा जाता है कि past में किसी ने बुरा किया इसका मतलब ए नहीं कि वो अब भी बुरा हो। वो इंसान बदल भी सकता है। डाकू वाल्मिकी संत वाल्मिकी बन गया है। अगर अब भी हम उसको डाकु समझेंगे तो यह हमारी भुल है। हमें हमारी सोच ही हमें पीछे ले जा रही है। कोई भी ऐसा है या ना है हमें हमेशा सबके प्रति पॉजिटिव ही सोचना है। सिर्फ वर्तमान में जिएं।

Meditation – ध्यान प्रेक्षाध्यान करें। इससे मन की चंचलता को control कर सकते है। अपने भीतर एक अलग संसार है उस संसार का अनुभव कर वास्तविक खुशी और परम आनंद की अनुभुति कर सकते है।

 

मंत्र जप करें- ओम् शांति, सिद्धा सिद्धि मम् दिसंतु या आपको जो मंत्र अच्छा लगे उनका जप करें। इससे भी हमारी मन की चंचालता दुर होगी।

 

अंत में बस इतना ही कहना चाहती हूं कि चाहे हम हर समय धर्म ध्यान कर सके या ना कर सके लेकिन हमको अपनी सोच को positive और पवित्र बनाना है और वर्तमान में जीना है। मान हो या अपमान, सुख हो या दु:ख, लाभ हो या हानि हमेशा समता, संतोष रखे। इसी में ही वास्तविक खुशी छिपी है। यही Authentic happiness है। इसी formula  को अपनाएंगे तो हर परिस्थिति में हर पल, हर दिन, हर साल और पुरी जिंदगी खुश रह सकते है। कोई भी परिस्थिति में हमसे हमारी वास्तविक खुशी कोई नहीं छिन सकता है क्योंकि वास्तविक खुशी हमारे मन का एक ऐसा गहना है या सम्पति है जो कभी भी चुराई नहीं जा सकती।

 

अब मैं जो बोलने जा रही हुं वो आप ध्यान से सुनना और वास्तविक खुशी चाहिए तो ग़ांठ बांध लेना:-

 

चाह और चिंता, भय, कामना, राग-द्वेष, आवेश, यह सब उस अग्नि के ताप के समान है जो जीते जी व्यक्ति को जला देती है। वहीं दुसरी ओर समता, संतोष, सम्यक दृष्टिकोण, सकारात्मक सोच और चिंतन उस सूरज के ताप के समान है जो आपके मन रुपी सूरजमुखी फूल को ख़िला देती है। अब आपके ऊपर निर्भर है कि आपको जलना है या खिलना है। now choice is your ….

असली खुशी, शांति देखनी है, तो देखो साधु संतो में।

कंचन कामिनी को त्याग कर, करते रमण आत्मा में॥

 

 

 

 

 

 

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