स्वार्थी नहीं, परोपकारी बने

स्वार्थी नहीं, परोपकारी बने

 

स्वार्थी नहीं, परोपकारी बने

 

21 वीं सदी में, एक उदार एवं परोपकारी व्यक्ति को खोजना मुश्किल है, लेकिन प्रकाश की एक किरण हमेशा अंधेरे के आसपास मौजूद होती है। यह सच है कि अपनी भलाई के बारे में तो हर कोई सोचता है। लेकिन महान वही बनता है जो सर्वप्रथम दूसरों की भलाई के बारे में सोचता है। वहीं इंसान सबसे सुखी है जो सबकी खुशी में अपनी खुशी ढुंढता है। आज की 21वीं सदी में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जो दुसरों के बारे में सोचते हैं। आज का युग दिखावे का युग बन गया है। परोपकार, उदारता आदि गुण तो आज की युवा पीढ़ी में मानो जैसे लुप्त होते जा रहे हैं। सब अपनी ही दुनिया में मस्त यानि चार्वाक सिद्धांत “खाओ पीओ मोज करो” पर चल रहे हैं। आज की व्यक्ति की सोच/विचारधारा आजकल कुछ इस तरह की हो गयी है –

 

किं तीए सिरीए पीवराए जा होइ अन्न-देसम्मि। जा य न मित्तेहि समं जं चामित्ता न पेच्छन्ति।।

अर्थात्‌ – उस अत्यधिक लक्ष्मी से क्या लाभ, जो अन्य देश में मिले। जिसमें मित्रों का साथ न हो और जिसे शत्रु न देखें।

 

आज के आधुनिक लोगों में परोपकार/उपकार की भावना की जगह दिखावे की भावना व मानसिक सोच बनती जारी है। महेंगे ब्रांड़ेड कपड़े, कार, ज्वेलरी आदि खरीदते है ताकि दूसरों लोग ये सब देखकर जले। इतना धन कमा कर भी उनके भीतर किसी की मदद करने की भावना के बजाए, दिखावे व अपने स्वार्थ के पीछे नष्ट कर देते हैं। अगर मदद भी करते हैं तो उसके पीछे भी नाम, मान-सम्मान इत्यादि पाने की कामना, लालसा आदि की भावना रहती है  ताकि समाज में वो आदर के पात्र बनें। ऐसे लोगों के पास सब कुछ होते हुए भी द्ररिद्र होते हैं। वह धन-दौलत पाकर भी एक ऐसा स्वर्णिम अवसर और धन दोनों ही नष्ट करते हैं। क्योंकि धन आज है कल ना भी हो। लेकिन यदि उस धन का सद्-उपयोग कर, किसी जरुरत मंदों का उपकार करें तो उस धन को दुगुना-चौगुना भी सकता है।

सिद्धपुरुष ने सच ही कहा है कि

 

“संपत्ति पावेउं कायव्वो सव्व-सत्त उवयारो। अत्तोवयाल-लिच्छू उयरं पूरेइ काओ वि ॥“

अर्थात्‌ अपने उपकार को चाहने वाला कौआ भी पेट भर लेता है। अत: (महापुरूषों को) सम्पत्ति पाकर सभी प्राणियों का उपकार करना चाहिए। 

 

महापुरुष वही होता है को दूसरों की सोचता है।  जो अपनी हित-चिंता के साथ-साथ दूसरों की हित-चिंता भी करता है। वह  समाजोपयोगी कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेता है। वह जनकल्याण के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार रहता है। ऐसे परोपकार गुण वाले व्यक्ति को मानसिक सुख एवं संतुष्टि की अनुभुति होती है। ऐसे महापुरुषों को सभी युगों-युगों तक याद किया जाता है। इसीलिए हमेशा दूसरों को उपकार करें, इससे आपका उपकार भी स्वयं होगा। जिनके हृदय में हमेशा परोपकार करने की भावना रहती है, उनके समक्ष विपत्तियाँ नहीं आती है और अगर आती भी है तो वह भी दूर हो जाती है। पग-पग पर उन्हें सफलता हाथ लगती है।

 

गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है-

“परहित सरिस धर्म नहीं भाई पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।
परहित बसै जिनके मन माहीं, तिन्ह कहुं जग दुर्लभ कछु नाही।।“

 

अर्थात् दूसरे की भलाई करने के समान कोई धर्म नहीं है। जिनके ह्रदय में परोपकार की भावना रहती है वह संसार में सब कुछ कर सकते हैं उनके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

 

प्रकृति से सीखें परोपकार की भावना –

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं वह अकेला रह ही नहीं सकता है। सूर्य, नदी, चन्द्रमा, वृक्ष, वायु आदि परोपकारी ही तो हैं। प्रकृति प्रदत्त सभी तत्व परहित के लिए समर्पित हैं। उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं होता। प्रकृति प्रदत्त इन परोपकारी तत्वों के कारण ही मानव निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर है। अगर यह सब भी स्वार्थी बनकर रहें तो इस संसार में मानव जाति का तो जीना दुर्लभ हो जाएगा। इसीलिए परोपकारी व्यक्ति प्रकृति के जैसे नि:स्वार्थ और आत्म त्याग के द्वारा हर कार्य सच्ची निष्ठा, कर्तव्यनिष्ठता और सत्यता के साथ करते हैं। दीन दखियों, घायलों, अपंगों, अनाथों की मदद तथा विभिन्न अवसरों और स्थानों की स्थापना कर परोपकारी मानव कल्याण में अपना जीवन बिता देते हैं। कुएँ, धर्मशाला आदि बनाने का कार्य परोपकारी ही करते हैं। ऐसे व्यक्ति एक अलग प्रकार का सुख महसूस करते हैं। आत्मसंतोष मिलता है। उसकी आत्मा प्रसन्न होती हैं। परोपकारी व्यक्ति हमेशा सहानुभूति का पात्र बनते हैं।

सभी मानव समान है सभी को परस्पर प्रेम भाव से रहते हुए संकट में परस्पर मदद करनी चाहिए अपने लिए ही भोग विलास में लिप्त रहना पशु प्रवृत्ति है मानव मात्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करना ही मानव प्रवृत्ति है।

 

“यही पशु प्रवृत्ति है कि आप ही आप चरे,

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ॥“

 

परोपकार के अनेक उदाहरण

इतिहास तथा पुराणों के अनुसार महान व्यक्तियों ने परोपकार के लिए अपने शरीर का त्याग कर दिया। सभी धर्मों में भी परोपकार आदि की ऐसी बहुत-सी कथा-कहानियाँ मिलती है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम की उदारता किसे नहीं लुभाती है। अपनी उदार प्रकृति के कारण ही वे भक्तों के भगवान हैं, निर्बल के बल, दीनों के बंधु और नाथ हैं। देने की साम‌र्थ्य और निष्काम भावना ही व्यक्ति को सुदेव बनाती है। वृत्तासुर वध के लिए महर्षि दधीचि ने इंद्र को प्राणायाम द्वारा अपना शरीर अर्पित कर दिया था। इसी प्रकार महाराज शिवि ने एक कबूतर के लिए अपने शरीर का मांस भी दे दिया था। ऐसे महापुरुष धन्य हैं जिन्होंने परोपकार के लिए अपने प्राण त्याग दिए। संसार में अनेकानेक महान कार्य परोपकार की भावना से ही हुए है। आजादी प्राप्त करने के लिए भारत माता के अनेक सपूतों ने अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। महान संतो ने लोक कल्याण के लियें अपना जीवन अर्पित कर दिया था। उनके ह्रदय में लोक कल्याण की भावना थी। इसी प्रकार वैज्ञानिकों ने भी अपने आविष्कारों से जन-जन का कल्याण किया।

 

परोपकार से लाभ –

परोपकार से मानव का व्यक्तित्व विकास होता है। वह परोपकार की भावना के कारण नि:स्वार्थ भाव से स्व के स्थान पर सर्वप्रथम अन्य (पर) के लिए सोचता है। इसमें आत्मा का विकास होता है। इससे अलौकिक आनंद, आत्म संतोष और सुख का अनुभव होता है। अपना धन आदि विसर्जन करने से आत्मा का कल्याण भी होता है। भाईचारे की भावना बढ़ती है। विश्व बंधुत्व की भावना का विकास होता है। किसी को संकट से निकाले, भूखे को भोजन दें तो इसमें वास्तविक सुख की अनुभूति होती हैं। परोपकार को बड़ा पुण्य और परपीडन को पाप माना गया हैं।

 

कवि रहींम ने परोपकार की महिमा को स्वीकारते हुए कहा है कि

“रहिमन यों सुख होत है उपकारी के अंग
बाटनवारे को लगे ज्यों मेहंदी कौ रंग।“

अर्थात्‌ उपकार करते समय उपकार करने वाले शरीर को सुख की प्राप्ति होती हैं, जिस प्रकार मेहँदी बाटने वाले के अंगों पर भी मेहंदी का रंग अनचाहे लग जाता हैं।

 

सही पात्र की जांच –

परोपकार करते समय पात्र और उसकी पवित्रता जांचना ज़रूरी है। यदि जिसे मदद की आवश्यकता नहीं है उसकी मदद की जाए तो यह परोपकार नहीं कहलाएगा। वहीं दूसरी और यह भी देखना आवश्यक है कि इस दिखावें के युग में सच्चा परोपकारी कौन है ? जिन पुण्यात्माओं का जीवन उदारतासदाचारसहिष्णुतासद्विचारकल्याण-भावना आदि से ओतप्रोत होवे ऊँची आत्माएं हैं, वही किसी प्रकार की लालसा, कामना, स्वार्थ आदि से ऊपर उठकर पर का चिंतन करते हैं वही महापुरुष या सच्चा परोपकारी होता है।

 

उपसंहार –

तुलसीदास जी की युक्ति परहित सरिस धर्म नहीं भाईसे यह निष्कर्ष निकलता है परोपकार ही वह मूल मंत्र है। जो व्यक्ति को उन्नति के शिखर पर पहुंचा सकता है तथा राष्ट्र, समाज या किसी का आत्म उत्थान कर सकता है।

आत्मा में प्रकट सच्ची परोपकारिता व उदारता का गुण एक ऐसा विलक्षण गुण है कि उसके योग से अन्य अनेक गुण सरलता से प्रकट हो सकते हैं। यदि सचमुच ऐसे गुण आत्मा में आ जाए तो दूसरे उत्तम गुण स्वतः ही उसके साथ चले आते हैं। उदार परोपकार आत्मा की वृत्ति एवं प्रवृत्ति में सद्विचारों की सुन्दर शीतल छाँया सदा बनी रहती है और वह आत्मा को सांसारिक इच्छाओं के निरोध एवं सदाचार को अंगीकार करने के लिए प्रेरित करती रहती है। इस तरह जहां उदारतासदाचारसहिष्णुता और सद्विचार ये चारों उत्तम गुण मिल जाते हैंवहां क्या कमी रहे? ऐसे गुण केवल अपनी आत्मा के लिए ही हितकर नहीं है, अपितु अन्य असंख्य आत्माओं के लिए भी अत्यंत उपकारी सिद्ध हो सकता है। हमें अपनी आत्मा को ऐसा ही बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

 

 

Writer/Blogger – Bindu Bothra

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